पादीनां पिबादयः स्युरित्संज्ञकशकारादौ प्रत्यये परे।
पिबादेशोऽदन्तस्तेन न गुणः। पिबति।
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पा धातु पीने के अर्थ में है। अनिट् है। पिबति= पीता है।
४८७- पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीय-
सीदाः। पाश्च घ्राश्च ध्माश्च स्थाश्च म्नाश्च दाण्च दृशिश्च अर्तिश्च सर्तिश्च शद् च, सद्
च तेषामितरेतरद्वन्द्वः पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदः, तेषां पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्ति-
सर्तिशदसदां। पिबश्च जिघ्रश्च धमश्च तिष्ठ, मनश्च यच्छश्च पश्यश्च ऋच्छश्च धौश्च
शीयश्च सीदश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीयसीदाः।
पाघ्राध्मास्थाम्ना-दाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदां षष्ठ्यन्तं, पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीयसीदाः
प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ष्ठिवुक्लमुचमां शिति से शिति की अनुवृत्ति आती
है।
इत्संज्ञक शकारादि प्रत्यय के परे रहते पा, घ्रा आदि धातुओं के स्थान पर
पिब, जिघ्र आदि आदेश होते हैं।
इत्संज्ञक शकार जैसे तिङन्त प्रकरण में शप्, श्यन्, श आदि और कृदन्त
प्रकरण के शतृ, शानच्, खश् आदि प्रत्ययों के परे होने पर यह सूत्र पा, घ्रा आदि धातुओं
के स्थान पर पिब, जिघ्र आदि आदेश करता है। यथासंख्यमनुदेशः समानाम् के नियम से
क्रमशः होता है और सभी आदेश अनेकाल् हैं, अतः अनेकाल्शित्सर्वस्य के नियम से
सर्वादेश भी होता है। लिट्, लृट्, लृट्, आशीर्लिङ्, लृङ् और लृङ् लकारों में यह आदेश नहीं
होगा, क्योंकि यहाँ शकार-इत्संज्ञक प्रत्यय नहीं मिलता है। ये पिब आदि आदेश अदन्त हैं।
यदि हलन्त आदेश होते तो पुगन्तलघूपधस्य च से गुण होकर पेबति ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।
इस प्रकार से पा के स्थान पर पिब, घ्रा के स्थान पर जिघ्र, ध्मा के स्थान पर
धम, स्था के स्थान पर तिष्ठ, म्ना के स्थान पर मन, दाण् के स्थान पर यच्छ, दृश् के
स्थान पर पश्य, ऋ के स्थान पर ऋच्छ, सृ के स्थान पर धौ, शद् के स्थान पर शीय और
सद् के स्थान पर सीद आदेश होंगे।
पिबति। पा धातु से लट्, तिप्, शप् अनुबन्धलोप करके पा+अ+ति बना।
पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीयसीदाः से
शकार इत्संज्ञक शप् वाले अकार के परे होने पर पा के स्थान पर पिब आदेश हुआ, पिब
अ ति बना। पिब+अ में अतो गुणे से पररूप हुआ- पिबति।
लट्- पिबति, पिबतः, पिबन्ति। पिबसि, पिबथः, पिबथ। पिबामि, पिबावः,
पिबामः।