Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 486
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
क्रमः परस्मैपदेषु
Aṣṭādhyāyī 7.3.76
Vṛtti Varadarājācārya

क्रमो दीर्घः परस्मैपदे शिति। क्राम्यति, क्रामति। चक्राम। क्रमिता।

क्रमिष्यति। क्राम्यतु, क्रामतु। अक्राम्यत्, अक्रामत्। क्राम्येत्, क्रामेत्।

क्रम्यात्, अक्रमीत्।

अक्रमिष्यत्। पा पाने॥१६॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४८६- क्रमः परस्मैपदेषु। क्रमः पञ्चम्यन्तं, परस्मैपदेषु सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

छित्तुक्लमुचमां शिति से शिति और शमामष्टानां दीर्घः श्यनि से दीर्घः को अनुवृत्ति आती

है। अङ्गस्य का अधिकार है।

परस्मैपदपरक शित् के परे होने पर क्रम को दीर्घ होता है।

अचश्च से अचः की उपस्थिति होने से क्रम् में अच्-अकार के स्थान पर दीर्घ

हो जायेगा। परस्मैपद में ही दीर्घ होता है। यदि अर्थभेद या उपसर्ग आदि से यह धातु

आत्मनेपदी हो जाय तो दीर्घ नहीं होता है। जैसे- प्रक्रमते, आक्रमते।

क्राम्यति। क्रम् से लट्, तिप्, शप् प्राप्त, उसे बाधकर के वा

भ्राशभ्राशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः से वैकल्पिक श्यन्, अनुबन्धलोप करके क्रम्+यति

बना। क्रमः परस्मैपदेषु से दीर्घ होकर क्राम्+यति बना। वर्णसम्मेलन होकर क्राम्यति सिद्ध

हुआ। श्यन् न होने के पक्ष में शप् ही होता है। अतः क्रामति यह रूप बनेगा। दीर्घ दोनों

में होता है, क्योंकि शप् और श्यन् दोनों ही शित् प्रत्यय हैं।

लट्-लकार श्यन् पक्ष में- क्राम्यति, क्राम्यतः, क्राम्यन्ति, क्राम्यसि, क्राम्यथः, क्राम्यथ,

क्राम्यामि, क्राम्यावः, क्राम्यामः। शप् पक्ष में- क्रामति, क्रामतः, क्रामन्ति, क्रामसि, क्रामथः,

क्रामथ, क्रामामि, क्रामावः, क्रामामः। लिट्- चक्राम, चक्रमतुः, चक्रमुः, चक्रमिथ, चक्रमथुः,

चक्रम, चक्राम-चक्रम, चक्रमिव, चक्रमिम। लुट्-क्रमिता, क्रमितारौ, क्रमितारः, क्रमितासि।

लृट्- क्रमिष्यति, क्रमिष्यतः, क्रमिष्यन्ति, क्रमिष्यसि। लोट्- श्यन्-पक्षे- क्राम्यतु-क्राम्यतात्,

क्राम्यताम्, क्राम्यन्तु। शप्पक्षे- क्रामतु-क्रामतात्, क्रामताम्, क्रामन्तु। लङ्- श्यन्पक्षे-

अक्राम्यत्, अक्राम्यताम्, अक्राम्यन्। शप्पक्षे- अक्रामत्, अक्रामताम्, अक्रामन्। विधिलिङ्-

क्राम्येत्, क्राम्येताम्, क्राम्येयुः। क्रामेत्, क्रामेताम्, क्रामेयुः। आशीर्लिङ्- क्रम्यात्, क्रम्यास्ताम्,

क्रम्यासुः आदि।

लुङ् में- अक्रम्+इस्+ईत् बनने के बाद वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि प्राप्त, उसका नेटि

से निषेध प्राप्त, उसे भी बाधकर अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक इट् प्राप्त, मकारान्त होने

के कारण उसे भी बाधकर के ह्यान्तक्षणश्वसजागृणिश्वेदिताम् से निषेध हुआ। सकार का

इटः इटि से लोप करके सवर्णदीर्घ करने पर अक्रमीत् यह रूप बनता है। अक्रमीत्,

अक्रमिष्टाम्, अक्रमिषुः, अक्रमीः, अक्रमिष्टम्, अक्रमिष्ट, अक्रमिषम्, अक्रमिष्व, अक्रमिष्म।

लृङ् में- अक्रमिष्यत्, अक्रमिष्यताम्, अक्रमिष्यन् आदि।