एभ्यः श्यन् वा कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे। पक्षे शप्।
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४८५- वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः। भ्राशश्च भ्लाशश्च भ्रमुश्च क्रमुश्च, क्लमुश्च, त्रसिश्च त्रुटिश्च लष् च तेषां समाहारद्वन्द्वः भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलष्, तस्माद् भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः। वा अव्ययपदं, भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन्, सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके, और कर्तरि शप् से कर्तरि की अनुवृत्ति आती है।
कर्ता अर्थ वाले सार्वधातुक के परे होने पर भ्राश, भ्राश, भ्रम, क्रम,
क्लम्, त्रस्, त्रुटि और लष् धातुओं से विकल्प से श्यन् होता है।
यह शप् को बाधकर के होता है। वैकल्पिक है, अतः न होने के पक्ष में शप् भी
हो जाता है। श्यन् में शकार और नकार की इत्संज्ञा होती है। शित् के अनेक प्रयोजन हैं।
सामान्यतया श्यन् दिवादिगणीय धातुओं से होता है किन्तु यहाँ पर उक्त धातुओं से विशेष
विधान किया गया है। यहाँ प्रसंग में क्रम् धातु है।