तासौ नित्यानिट ऋदन्तादेव थलो नेट्, भारद्वाजस्य मते। तेन अन्यस्य
(धातो:) स्यादेव। अयमत्र सङ्ग्रहः-
अजन्तोऽकारवान् वा यस्तास्यनिट् थलि वेडयम्।
ऋदन्त ईदृङ् नित्यानिट् क्राद्यन्यो लिटि सेड् भवेत्॥
चिक्षयिथ, चिक्षेथ। चिक्षियथुः। चिक्षिय। चिक्षाय, चिक्षय। चिक्षियिव।
चिक्षियिम। क्षेता। क्षेष्यति। क्षयतु। अक्षयत्। क्षयेत्।
.....
४८२- ऋतो भारद्वाजस्य। ऋतः पञ्चम्यन्तं, भारद्वाजस्य षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् से तास्वत्, थलि, अनिट्, नित्यम् की तथा तासि च क्लृपः से तासि, गमेरिट् परस्मैपदेषु से इट् तथा न वृद्ध्यश्चतुर्भ्यः से न की अनृवृत्ति आती है।
भारद्वाज ऋषि के मत में- तासि प्रत्यय के परे होने पर नित्य से अनिट् होने वाले केवल ह्रस्व ऋकारान्त धातुओं से ही थल् को इट् न हो (अन्य धातुओं से थल् को इट् हो जाय)।
अब प्रश्न उठता है कि ऋदन्त धातु भी अजन्त ही हैं तो अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् से इट् का निषेध प्राप्त था ही, पुनः इस सूत्र से निषेध करने का क्या प्रयोजन? इस पर उत्तर यह है कि सिद्धे सति आरभ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति। सिद्ध होते हुए उसी कार्य के लिए पुनः विधान करना नियम के लिए होता है। यहाँ पर नियमार्थ माना गया है। नियम यह है कि तासि के परे नित्य अनिट् केवल ऋदन्त धातु से परे ही थल् को इट् न हो, अन्य धातुओं से परे थल् को इट् हो जाय। यह भारद्वाज ऋषि का मत है। पाणिनि जी ने भारद्वाज का नाम लेकर ही यह सिद्ध कर दिया कि यह मत उनका है, मेरा नहीं। दो मत होने पर, वह भी किसी प्रतिष्ठित ऋषि का मत हो तो पाणिनि जी उनका सम्मान भी करते हैं। उनका संकेत है कि यहाँ पर दोनों मतों को माना जाय।
इस तरह यहाँ पर विकल्प सिद्ध हुआ- भारद्वाज के मत में और पाणिनि आदि अन्य आचार्यों के मत में। भारद्वाज के मत में ऋदन्तभिन्न धातुओं से परे थल् को इट् का आगम होता है और पाणिनि आदि अन्य ऋषियों के मत में इट् नहीं होता है। जैसे- या धातु है, वह तासि के परे अनिट् है, ऋदन्त से भिन्न भी है तो भारद्वाज के मत में थल् में इट् होगा जिससे ययिथ बनेगा और पाणिनि के मत में इट् नहीं होगा, अतः ययाथ बनेगा।
.....
पूर्वोक्त चारों सूत्रों का निचोड़ एक ही कारिका में संग्रह करके बताया गया है- अजन्तोऽकारवान् वा आदि से। इसका प्रथम भाग है- अजन्तोऽकारवान् वा यस्तास्यनिट् थलि वेडयम्। अन्वय- यः तासि नित्यानिट् (तादृशः) अजन्तः अकारवान् वा अयम् थलि वेट्, (वा=विकल्पेन इट् अस्ति यस्य स धातुः वेट्) अर्थात् जो धातु तासि प्रत्यय के परे नित्य से अनिट् होते हुए अजन्त या अकार वाली धातु हैं, वे थल् में विकल्प से इट् वाली होती हैं। जैसे पपिथ-पपाथ। यह ऋतो भारद्वाजस्य का उदाहरण है। इस उदाहरण में अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् और उपदेशोऽत्वतः ये दो सूत्र थल् के इट् का निषेध कर रहे थे किन्तु ऋदन्तभिन्न होने के कारण भारद्वाजनियम से इट् हो जाता है और अन्यों के मत में इट् नहीं होता।
कारिका का दूसरा भाग है- ऋदन्त ईदृङ् नित्यानिट्। ईदृङ्=इसी तरह तासि के परे रहते नित्यानिट् ह्रस्व ऋकारान्त धातु थल् के परे रहने पर भी नित्य से अनिट् ही रहता है। कारण यह है कि ऐसे धातु को तो अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् और उपदेशोऽत्वतः ये दो सूत्र भी निषेध कर रहे हैं और स्वयं भारद्वाज जी भी। अतः ऋदन्त धातु थल् में नित्यानिट् होते हैं।
कारिका का तीसरा भाग है- क्राद्यन्यो लिटि सेड् भवेत्। अर्थात् कृ, सृ, भृ, वृ, स्तु, द्रु, स्रु और श्रु इन आठ धातुओं को छोड़कर शेष सभी अनुदात्त धातु लिट् में सेट् हो जाते हैं। अर्थात् लिट् में इट् हो जाता है। छिद्, भिद् आदि धातु कृ आदि आठ धातुओं से भिन्न हैं, अतः अनुदात्त होने पर भी इन से परे लिट् को इट् हो जाता है। बिभेदिथ, बिभेदिव, बिभेदिम, चिच्छेदिथ, चिच्छेदिव, चिच्छेदिम आदि। कारिका तीसरा भाग कृसृभृवृस्तुद्रुसुश्रुवो लिटि के लिए है। क्षि आदि धातु कृ आदि से भिन्न हैं, अतः इससे लिट् में इट् होता है। अन्तर यह है कि लिट् के केवल थल् में पूर्वोक्त भारद्वाज नियम के अनुसार विकल्प से इट् होता है- चिक्षयिथ, चिक्षेथ।
चिक्षयिथ, चिक्षेथ। क्षि धातु से लिट्, सिप् उसके स्थान पर थल् आदेश करके, धातु को द्वित्व, हलादिशेष, चुत्व होने पर चिक्षिथ बना। थ को आर्धधातुकस्येड् वलादेः इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशोऽनुदात्तात् से निषेध प्राप्त हुआ। कृसृभृवृस्तुद्रुसुश्रुवो लिटि के नियम से लिट् में इट् होने का नियम प्राप्त हुआ। पुनः अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् से थल् होने के कारण इट् का निषेध प्राप्त हुआ तो ऋतो भारद्वाजस्य से भारद्वाज के मत में इट् और अन्यों के मत में इट् का निषेध हुआ। इस तरह विकल्प से इट् का आगम हुआ। चिक्षि+इथ बना। सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण होकर चिक्षे इथ, अय् आदेश, चिक्षयिथ सिद्ध हुआ। इट् न होने के पक्ष चिक्षेथ बना। इस तरह दो रूप सिद्ध हुए।
द्विवचन अथुस्, में अजादि होने के कारण वलादि नहीं है, अतः इट् का प्रसंग नहीं है। व और म में थल् नहीं है, अतः थल्-विषयक तीनों सूत्र नहीं लगते। अतः एकाच उपदेशोऽनुदात्तात् से इट् निषेध प्राप्त था, क्रादिनियम से इट् होता है। जिससे चिक्षयिव, चिक्षयिम ये रूप बनते हैं।
लिट् के रूप- चिक्षाय, चिक्षियतुः, चिक्षियुः, चिक्षयिथ-चिक्षेथ, चिक्षियथुः, चिक्षिय, चिक्षाय-चिक्षय, चिक्षयिव, चिक्षयिम।
लुट्- क्षेता, क्षेतारौ, क्षेतारः, क्षेतासि, क्षेतास्थः, क्षेतास्थ, क्षेतास्मि, क्षेतास्वः, क्षेतास्मः।
लुट् लकार में इट् होता ही नहीं है, क्योंकि ऊद्दन्तैर्योति० इस कारिका के
नियम से यह धातु उपदेश अवस्था मे एकाच् और अनुदात्त है। अतः एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् का निषेध हो जाता है। इसी तरह लृट्, लुङ्, लृङ् लकार में भी इट् का निषेध हो जाता है।
लृट्- क्षेष्यति, क्षेष्यतः, क्षेष्यन्ति, क्षेष्यसि, क्षेष्यथः, क्षेष्यथ, क्षेष्यामि, क्षेष्यावः, क्षेष्यामः।
लोट्- क्षयतु-क्षयतात्, क्षयताम्, क्षयन्तु, क्षय-क्षयतात्, क्षयतम्, क्षयत, क्षयाणि, क्षयाव, क्षयाम। लङ्- अक्षयत्, अक्षयताम्, अक्षयन्, अक्षयः, अक्षयतम्, अक्षयत, अक्षयम्, अक्षयाव, अक्षयाम। विधिलिङ्- क्षयेत्, क्षयेताम्, क्षयेयुः, क्षयेः, क्षयेतम्, क्षयेत, क्षयेयम्, क्षयेव, क्षयेम।