उपदेशेऽकारवतस्तासौ नित्यानिटः परस्य थल इण् न स्यात्।
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४८१- उपदेशेऽत्वतः। अत् अस्य अस्तीति अत्वान्, मतुप्, तस्य अत्वतः। उपदेशे सप्तम्यन्तम्, अत्वतः पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् से तास्वत्, थलि, अनिट् और नित्यम्, तासि च क्लृपः से तासि, गमेरिट् परस्मैपदेषु से इट् तथा न वृद्ध्यश्चतुर्भ्यः से न की अनुवृत्ति आती है।
उपदेश अवस्था में ह्रस्व अकार वाली धातु, जो तासि के परे नित्य से अनिट् हो, उससे परे थल् को इट् नहीं होता है।
पूर्वसूत्र से अजन्त धातुओं में निषेध किया गया तो इस सूत्र से जिसमें ह्रस्व अकार हो ऐसी धातुओं से परे थल् को इट् निषेध किया गया। अकारान्त धातु भी अकारवान् होता
है फिर भी उसको अजन्त मानकर पूर्वसूत्र से ही इट् का निषेध किया जा सकता है। अतः यहाँ अकारवान् से हलन्त अकारवान् धातु को ही लेना चाहिए। अतः ऐसी धातुएँ तासि के परे अनिट् होती हैं। जैसे- पक्ता, शक्ता आदि। तात्पर्य यह है कि यदि ये धातुएँ तासि में अनिट् हैं तो थल् में भी अनिट् ही रहेंगी।
इन दोनों सूत्रों से तासि के परे अनिट् होने वाले अजन्त और अकारवान् धातुओं से थल् में इट् का निषेध किया गया। अब अग्रिम सूत्र से इस विषय में भारद्वाज ऋषि का मत बतलाया जाता है।