Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 483
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः
Aṣṭādhyāyī 7.4.25
Vṛtti Varadarājācārya

अजन्ताङ्गस्य दीर्घो यादौ प्रत्यये न तु कृत्सार्वधातुकयोः। क्षीयात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४८३- अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः। कृत् च सार्वधातुकञ्च कृत्सार्वधातुके, न कृत्सार्वधातुके अकृत्सार्वधातुके, तयोः अकृत्सार्वधातुकयोः। अकृत्सार्वधातुकयोः सप्तम्यन्तं, दीर्घः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है। अचश्च इस परिभाषा सूत्र से अचः की उपस्थिति होती है। अयङ् यि विङ्गति से यि की अनुवृत्ति आती है।

यकार जिस के आदि में हो ऐसे प्रत्यय के परे होने पर अजन्त अङ्ग को दीर्घ होता है किन्तु कृत्-संज्ञक प्रत्ययों और सार्वधातुक प्रत्ययों के परे होने पर नहीं।

क्षीयात्। क्षि से आशीर्लिङ्, तिप्, यासुट्, अनुबन्धलोप, संयोगादिलोप करके क्षि+यात् बना है। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होकर क्षीयात् सिद्ध हुआ।

आशीर्लिङ्- क्षीयात्, क्षीयास्ताम्, क्षीयासुः, क्षीयाः, क्षीयास्तम्, क्षीयास्त, क्षीयासम्, क्षीयास्व, क्षीयास्म।