उपदेशेऽजन्तो यो धातुस्तासौ नित्यानिट् ततस्थल इण् न।
४८०- अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम्। तासि इव तास्वत्, सप्तम्यन्ताद्वतिः। अविद्यमान इट् यस्मिन् स अनिट्, बहुव्रीहिः। अचः पञ्चम्यन्तं, तास्वत् अव्ययपदम्, थलि सप्तम्यन्तम्, अनिटः पञ्चम्यन्तं, नित्यं क्रियाविशेषणम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। उपदेशेऽत्वतः से उपदेशे का अपकर्षण होता है। तासि च क्लृपः से तासि, गमेरिट् परस्मैपदेषु से इट् तथा न वृद्ध्यश्चतुर्भ्यः से न की अनुवृत्ति आती है।
उपदेश अवस्था में अजन्त धातु, जो तासि प्रत्यय के परे होने पर अनिट् हो, उससे परे थल् को इट् नहीं होता है।
जैसे क्षि धातु उपदेश अवस्था में अजन्त है और तासि प्रत्यय के परे होने पर नित्य से अनिट् रहता है जिससे क्षेता रूप बनता है, इस धातु से क्रादिनियम (कृ आदि धातुओं से ही लिट् को इट् न हो, अन्य से हो) से इट् की प्राप्ति थी, इस सूत्र के द्वारा प्राप्त इट् का थल् में निषेध हो जाता है। स्मरण रहे कि यह सूत्र थल् में इट् का निषेध करता है, अन्यत्र नहीं।
इस प्रसंग का अग्रिम सूत्र है-