Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 479
इङ्विधायकं नियमसूत्रम्
कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि
Aṣṭādhyāyī 7.2.13
Vṛtti Varadarājācārya

क्रादिभ्य एव लिट इण्न स्याद् अन्यस्मादनिटोऽपि स्यात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

चिक्षाय। क्षि से लिट्, तिप्, णल्, क्षि+अ बना। द्वित्व होकर क्षिक्षि+अ बना। हलादिशेष होने पर क्षि में विद्यमान क् और ष् में से ष् का लोप तथा क् शेष बचा, किक्षि+अ बना। कुहोश्चुः से ककार के स्थान पर चुत्व आदेश हुआ, चिक्षि+अ बना। अचो ज्ञिति से क्षि में इकार को वृद्धि होकर चिक्षै+अ बना। आय् आदेश होकर चिक्षाय सिद्ध हुआ। द्विवचन में णित् न होने के कारण वृद्धि नहीं होती और असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव होकर किङ्ति च से गुण निषेध होता है। अतः चिक्षि+अतुस् में इकार के स्थान पर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्वङौ से इयङ् आदेश होकर चिक्ष्+इय्+अतुस् बना। वर्णसम्मेलन होकर चिक्षियतुः सिद्ध होता है। इसी तरह बहुवचन में चिक्षियुः बनता है। क्षि में संयोग होने से कैसे असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव होगा? ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि क्षि में क् और ष् का संयोग आदि में है। उससे परे परे अतुस् आदि प्रत्यय नहीं हैं अर्थात् संयोग और प्रत्यय की बीच में अव्यवधान हो तो यह निषेध लगता है अर्थात् जिस धातु में संयोग अन्त में होता है, ऐसी धातुओं से परे लिट् को ही कित् नहीं होता, जैसे कि ननन्द्+अतुस् आदि में ४७९- कृ-सृ-भृ-वृ-स्तु-द्रु-स्रु-श्रुवो लिटि। कृश्च सृश्च भृश्च वृश्च स्तुश्च द्रुश्च स्रुश्च श्रुश्च तेषां समाहारद्वन्द्वः कृसृभृवृस्तुद्रुसुश्रुः, सौत्रं पुंस्त्वम्। तस्मात् कृसृभृवृस्तुद्रुसुश्रुवः। कृसृभृवृस्तुद्रुसुश्रुवः पञ्चम्यन्तं, लिटि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। नेड् वशि कृति से न और इट् की अनुवृत्ति आती है।

कृ, सृ, भृ, वृ, स्तु, द्रु, स्रु और श्रु धातुओं से परे ही लिट् को इट् न हो, अन्य अनिट् धातुओं से परे लिट् को इट् का आगम हो जाय।

यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि कृ, सृ, भृ ये तीन धातुएँ एकाच् और अनुदात्त हैं, अतः एकाच् उपदेशेऽनुदात्तात् से ही इनमें इट् का निषेध हो रहा था और अनुदात्त न होने से वृ में एकाच् उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध न होने पर भी श्रुकुः किति से निषेध हो रहा था तो पुनः निषेध करने के लिए इस सूत्र में कृ, सृ, भृ, वृ का ग्रहण क्यों किया गया? इसका उत्तर यह है कि सिद्धे सति आरम्भ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति। सिद्ध होते हुए पुनः वही विधि कही जाती है तो वहाँ कुछ न कुछ नियम बनता है। यहाँ पर नियम यह बना कि- कृ आदि धातुओं से ही परे लिट् को इट् का आगम न हो, उनके अतिरिक्त अन्य अनिट् धातुओं से परे लिट् को इट् का आगम हो जाय। इस नियम के अनुसार कृ आदि धातुओं के अतिरिक्त धातुओं से परे वलादि आर्धधातुक को इट् का निषेध कहा गया हो तो भी इट् हो जायेगा।

इस सूत्र के उक्त चार धातुओं के अतिरिक्त अन्य जो स्तु, द्रु, स्रु और श्रु धातुएँ हैं, वे नियममार्थ नहीं अपितु किसी अन्य प्रयोजन के लिए पढ़ी गई हैं। वह प्रयोजन यह है

कि इन धातुओं से परे थल् को ऋतो भारद्वाजस्य से वैकल्पिक इट् प्राप्त था, तथा वस्, मस् को क्रादि नियम से इट् प्राप्त था, उसे रोकने के लिए स्तु, दू, सु, शु का ग्रहण किया गया है। तात्पर्य यह है कि लिट् में उक्त चारों धातुओं को कहीं भी इट् न हो। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि इन आठों धातुओं से परे लिट् सम्बन्धी सभी वलादि आर्धधातुक को इडागम नहीं होता।

क्रादिनियम व्याकरणशास्त्र में प्रसिद्ध है। वह यह कि कृ आदि धातुओं से ही लिट् को इट् का आगम नहीं होता, उनके अतिरिक्त अन्य अनिट् धातुओं से परे लिट् को इट् का आगम हो जाता है। इस नियम के अनुसार कृ आदि धातुओं के अतिरिक्त धातुओं से लिट् को जहाँ इट् का निषेध कहा गया है वहाँ भी इट् हो जायेगा।