झलः परस्य सस्य लोपो झलि। अगौप्ताम्। अगौप्सुः। अगौप्सीः।
अगौप्तम्। अगौप्त। अगौप्सम्। अगौप्स्व। अगौप्स्म। अगोपायिष्यत्,
अगोपिष्यत्, अगोप्स्यत्।
क्षि क्षये॥१३॥
क्षयति। चिक्षाय। चिक्षियतुः। चिक्षियुः।
एकाच इति निषेधे प्राप्ते-
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४७८- झलो झलि। झलः षष्ठ्यन्तं, झलि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में रात्सस्य से सस्य और संयोगान्तस्य लोपः से लोपः की अनुवृत्ति आती है।
झल् से परे सकार का लोप होता है झल् के परे होने पर।
अगौप्ताम्। अगुप्+स्+ताम् में वृद्धि होकर अगौप्+स्+ताम् बना। झलो झलि से सकार का लोप होने पर अगौप्+ताम् बना। वर्णसम्मेलन होकर अगौप्ताम् यह रूप सिद्ध हुआ। बहुवचन में अगौप्+स्+उस् में झल् परे न होने के कारण सकार का लोप नहीं हुआ। अतः अगौप्सुः बना। इस तरह गुप् धातु के आय पक्ष और आय न होने के पक्ष में तथा इट् होने के पक्ष और इट् न होने के पक्ष में निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं।
गुप् के लुङ् में आय और इट् आगम पक्ष के रूप
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अगोपायीत्
अगोपायिष्टाम्
अगोपायिषुः
मध्यमपुरुष
अगोपायीः
अगोपायिष्टम्
अगोपायिष्ट
उत्तमपुरुष
अगोपायिषम्
अगोपायिष्व
अगोपायिष्म
गुप् के आय न होने व इट् आगम पक्ष के रूप
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अगोपीत्
अगोपिष्टाम्
अगोपिषुः
मध्यमपुरुष
अगोपीः
अगोपिष्टम्
अगोपिष्ट
उत्तमपुरुष
अगोपिषम्
अगोपिष्व
अगोपिष्म
गुप् के आय न होने व इट् भी न होने के पक्ष में रूप
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अगौप्सीत्
अगौप्ताम्
अगौप्सुः
मध्यमपुरुष
अगौप्सीः
अगौप्तम्
अगौप्त
उत्तमपुरुष
अगौप्सम्
अगौप्स्व
अगौप्सम्
लृङ् लकार में तो कोई कठिनाई नहीं है। स्य यह आर्धधातुक प्रत्यय है, अतः आय विकल्प से होगा। आय होने के पक्ष में अगोपाय+इस्य+त् में अतो लोपः से गोपाय के अकार का लोप, स्य के सकार को षत्व, वर्णसम्मेलन होकर अगोपायिष्यत्, अगोपायिष्यताम्, अगोपायिष्यन्, अगोपायिष्यः, अगोपायिष्यतम्, अगोपायिष्यत, अगोपायिष्यम्, अगोपायिष्याव, अगोपायिष्याम बनते हैं। आय न होने और वैकल्पिक इट् होने के पक्ष में अगोपिष्यत्, अगोपिष्यताम्, अगोपिष्यन्, अगोपिष्यः, अगोपिष्यतम्, अगोपिष्यत, अगोपिष्यम्, अगोपिष्याव, अगोपिष्याम और इट् न होने के पक्ष में अगोप्स्यत्, अगोप्स्यताम्, अगोप्स्यन्, अगोप्स्यः, अगोप्स्यतम्, अगोप्स्यत, अगोप्स्यम्, अगोप्स्याव, अगोप्स्याम।
क्षि क्षये। क्षि धातु नाश होना, क्षीण होना अर्थ में हैं। ध्यान रहे कि नाश करना अर्थ नहीं है। अतः अकर्मक है। यदि नाश करना अर्थ होता तो सकर्मक हो जाता। क्षि में इकार की इत्संज्ञा नहीं होती है।
क्षयति। क्षि धातु से लट्, तिप्, शप् करके क्षि+अ+ति है। क्षि के इकार को
सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण होकर क्षे बनता है और उसके स्थान पर एचोऽयवायावः से अय् आदेश होकर क्ष्+अय्+अ+ति बना। वर्णसम्मेलन होकर रूप बने- क्षयति, क्षयतः, क्षयन्ति, क्षयसि, क्षयथः, क्षयथ, क्षयामि, क्षयावः, क्षयामः।