Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 477
वृद्धिनिषेधकं सूत्रम्
नेटि
Aṣṭādhyāyī 7.2.4
Vṛtti Varadarājācārya

इडादौ सिचि हलन्तस्य वृद्धिर्न। अगोपीत्, अगौप्सीत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४७७- नेटि। न अव्ययपदम्, इटि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। वदव्रलहन्तस्याचः से हलन्तस्य की और सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है।

इट् आदि में हो ऐसे सिच् के परे होने पर हलन्त धातु को वृद्धि नहीं होती है।

वदव्रजहलन्तस्याचः के द्वारा वद्, व्रज् और हलन्त धातुओं को सिच् परे होने पर वृद्धि कही गई है, उसका यहाँ इडादि सिच् के परे होने पर निषेध किया गया है परन्तु वद् और व्रज् धातुओं का विशेष विधान है, अतः उनमें निषेध प्रवृत्त नहीं होगा, निषेध केवल हलन्तों में ही होगा।

अगोपीत्। अगुप्+इस्+ईत् होने के बाद वदव्रजहलन्तस्याचः से प्राप्त वृद्धि का यह निषेध करता है। वृद्धि न होने पर पुगन्तलघूपधस्य च से गुण हुआ- उकार को गुण ओ होता है। अतः अगोप्+इस्+ईत् बना। सकार का लोप, सवर्णदीर्घ, वर्णसम्मेलन होकर अगोपीत् सिद्ध हुआ। इट् भी न होने के पक्ष में अगुप्+इस्+ईत् है। यहाँ वलादि को मान कर होने वाला इट् नहीं हुआ है और अपृक्त को मानकर अस्तिसिचोऽपृक्ते से किया जाने वाला ईट् आगम हुआ है। यहाँ पर वृद्धि का नेटि से निषेध नहीं होगा, क्योंकि इट् न होने के कारण इडादि सिच् नहीं मिलता। अतः वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि हो गई, जिससे अगौप्+इस्+ईत् बना। वर्णसम्मेलन करके अगौप्सीत् बना। यहाँ इट ईटि से सकार का लोप भी नहीं होगा क्योंकि इट् से परे सकार नहीं है।

लुङ् के द्विवचन में आय होने के पक्ष में कुछ विशेष नहीं है, अतः अगोपायिष्टाम्

बनता है। इसी तरह आय न होने तथा इट् होने के पक्ष में अगोपिष्टाम् बनता है। इट् न होने के पक्ष में सकार का लोप करने के लिए अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है-