Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 475
इण्निषेधात्मकं विधिसूत्रम्
एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्
Aṣṭādhyāyī 7.2.10
Vṛtti Varadarājācārya

उपदेशे यो धातुरेकाज् अनुदात्तश्च तत आर्धधातुकस्येड् न।

ऊद्दृदन्तैर्योति-रु-क्ष्णु-शीङ्-स्नु-नु-क्षु-श्वि-डीङ्-श्रिभिः।

वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः॥

कान्तेषु शक्लेकः।

चान्तेषु पच्-मुच्-रिच्-वच्-विच्-सिचः षट्।

छान्तेषु प्रच्छेकः।

जान्तेषु त्यज्-निजिर्-भज्-भञ्ज्-भुज्-भ्रस्ज्-मस्ज्-यज्-युज्-रुज्-

रञ्ज्-विजिर्-स्वञ्ज्-सञ्ज्-सृजः पञ्चदश।

.....

दान्तेषु अद्-क्षुद्-खिद्-छिद्-तुद्-नुद्-पद्य-भिद्-विद्यति-विनद्-विन्द्-

शद्-सद्-स्विद्य-स्कन्द्-हदः षोडश।

धान्तेषु क्रुध्-क्षुध्-बुध्य-बन्ध्-युध्-रुध्-राध्-व्यध्-साध्-शुध्-सिध्या

एकादश।

नान्तेषु मन्यहनी द्वौ।

पान्तेषु आप्-क्षिप्-छुप्-तप्-तिप्-तृप्य-दृप्य-लिप्-लुप्-वप्-शप्-स्वप्-

सृपस्त्रयोदशः।

.....

भान्तेषु यभ्-रभ्-लभस्त्रयः।

मान्तेषु गम्-नम्-यम्-रमश्चत्वारः।

शान्तेषु क्रुश्-दश्-दिश्-दृश्-मृश्-रिश्-रुश्-लिश्-विश्-स्पृशो दश।

षान्तेषु कृष्-त्विष्-तुष्-द्विष्-दुष्-पुष्प्य-पिष्-विष्-शिष्-शुष्-शिलष्या

एकादश।

सान्तेषु घस्-वसती द्वौ।

हान्तेषु दह्-दिह्-दुह्-नह्-मिह्-रुह्-लिह्-वहोऽष्टौ।

अनुदात्ता हलन्तेषु धातवस्त्र्यधिकं शतम्।

गोपायाञ्चकर्थ। गोपायाञ्चक्रथुः। गोपायाञ्चक्र।

गोपायाञ्चकार-गोपायाञ्चकर। गोपायाञ्चकृव। गोपायाञ्चकृम।

गोपायाम्बभूव। गोपायामास। जुगोप। जुगुपतुः। जुगुपुः।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४७५- एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्। एकोऽच् यस्मिन् स एकाच्, तस्य एकाचः। एकाचः पञ्चम्यन्तम्, उपदेशे सप्तम्यन्तम्, अनुदात्तात् पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ऋत इद्धातोः से धातोः, नेड्वशि कृति से न एवं इट् की अनुवृत्ति आती है।

उपदेश अवस्था में जो धातु एक अच् वाला हो और साथ ही अनुदात्त भी हो तो उस धातु से परे आर्धधातुक प्रत्यय को इट् का आगम नहीं होता है।

यह सूत्र आर्धधातुकस्येड्वलादेः का निषेधक है। सूत्र में पठित उपदेशे इस पद का एकाचः के साथ भी अन्वय है और अनुदात्तात् के साथ भी। यहाँ पर देहलीदीपकन्याय चरितार्थ होती है। जैसे- दहलीज पर रखा दीपक अन्दर और बाहर दोनों तरफ प्रकाश देता है, उसी तहर बीच में पढ़ा गया उपदेशे यह शब्द एकाचः के साथ अन्वित होता है और अनुदात्तात् के साथ भी। एक ही धातु उपदेश अवस्था में अनुदात्त हो और उपदेश अवस्था में ही एकाच् भी हो यह सूत्र लगेगा।

यहाँ पर अनुबन्ध से रहित धातु को ही एकाच् या अनेकाच् माना गया है। उस एकाच् धातु में अनुदात्तत्व भी विद्यमान रहना चाहिए। यहाँ यह समझना जरूरी है कि अनुदात्तेत् धातुओं और अनुदात्त धातुओं में अन्तर है। जैसे एथ वृद्धौ धातु धकारोत्तरवर्ती अकार अनुदात्त है और उसकी उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। अतः यह धातु अनुदात्तेत् कहलाती है। इसलिए अनुदात्तङित आत्मनेपदम् सूत्र के द्वारा इस एथ् धातु से आत्मनेपद होता है परन्तु इस एथ् धातु को अनुदात्त धातु नहीं माना जाता। इसलिए इससे परे वलादि आर्धधातुक को इट् आगम का निषेध इस सूत्र से नहीं होता परन्तु गुप्त धातु अनुदात्तेत् नहीं अपितु उदात्तेत् है। अतः उससे परस्मैपद होता है किन्तु अनुदात्त धातु मानी जाती है। इसलिए इस सूत्र से इट् आगम का निषेध प्राप्त होता है।

अब निम्नलिखित कारिका से अजन्त एकाच् धातुओं में अनुदात्त धातुओं की व्यवस्था करते हैं।

ऊद्ददन्तैर्यौति-रु-क्ष्णु-शीङ्-स्नु-नु-क्षु-श्वि-डीङ्-श्रिभिः।

वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः॥

दीर्घ ऊकारान्त धातु, दीर्घ ऋकारान्त धातु, यु, रु, क्ष्णु, शीङ्, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्रि, वृङ् और वृञ् इन धातुओं को छोड़कर अन्य धातुएँ जो अजन्त धातुओं में एकाच् वे सभी धातुएँ निहत अर्थात् अनुदात्त हैं, ऐसा समझना चाहिए।

इस पद्य में उल्लिखित धातु उदात्त हैं, अनुदात्त नहीं है और इनसे भिन्न धातु अनुदात्त हैं। अजन्तों में उदात्त धातु कम और अनुदात्त धातु ज्यादा हैं, इस लिए उदात्त धातु को गिनाकर शेष धातुओं को अनुदात्त कह दिया गया है।

अजन्तों में अनुदात्त अधिक हैं और उदात्त कम। इसलिए उदात्तों को गिनकर बता दिया है। इनसे भिन्न अनुदात्त हैं।

कारिकास्थ अजन्त एकाच् उदात्त धातुओं का विवरण-

यु मिश्रणामिश्रणयोः(अदादिः)

रु शब्दे(अदादिः)

क्ष्णु तेजने(अदादिः)

शीङ् स्वप्ने(अदादिः)

स्नु प्रस्रवणे(अदादिः)

णु (नु)स्तुतौ(अदादिः)

टुक्षु शब्दे(अदादिः)

टुओश्वि गतिवृद्धयोः(भ्वादिः)

डीङ् विहायसा गतौ(दिवादिः)

श्रिञ् सेवायाम्(भ्वादिः)

वृङ् सम्भक्तौ(क्र्यादिः)

वृञ् वरणे(स्वादिश्चुरादिश्च)

निहताः=अनुदात्ताः। हलन्तों में उदात्त धातु बहुत और अनुदात्त धातु कम हैं, अतः सीधे अनुदात्त धातुओं का परिगणन करते हैं-

ककारान्त धातुओं में- शक् (शक्ल शक्तौ, स्वादिः) एक ही धातु अनुदात्त है। लूकार जोड़कर इसलिए कहा गया कि अन्य शक्, शक् आदि धातुएँ न लिए जायें।

चकारान्त धातुओं में- पच् (डुपचप् पाके भ्वादिः), मुच् (मुच्ल मोक्षणे, तुदादिः), रिच् (रिचिर् विरेचने, रुधादिः) तथा (रिच वियोजनसम्पर्चनयोः, चुरादिः), वच् (वच परिभाषणे, अदादिः), विच् (विचिर् पृथग्भावे, रुधादिः) और सिच् (षिच क्षरणे, तुदादिः) ये छः धातुएँ अनुदात्त हैं।

छकारान्त धातुओं में- प्रच्छ (प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्, तुदादिः) एक ही धातु अनुदात्त है।

जकारान्त धातुओं में त्यज् (त्यज हानौ, भ्वादिः), निजिर् (णिजिर् शौचपोऽग्नयोः, जुहोत्यादिः), भज् (भज सेवायाम्, भ्वादिः), भञ्ज् (भञ्जो आमर्दने, रुधादिः), भुज् (भुज पालनाऽभ्यवहारयोः, रुधादिः), तथा (भुजो कौटिल्ये, तुदादिः), भ्रस्ज् (भ्रस्ज पाके, तुदादिः),

मस्ज् (टुमस्जो शुद्धौ, तुदादिः), यज् (यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु, भ्वादिः), युज्,

(युजिर् योगे, रुधादिः), युज् (युज समाधौ, दिवादिः), तथा (युज संयमने, चुरादिः), रुज्

(रुजो भङ्गे, तुदादिः), रञ्ज् (रञ्ज रागे, भ्वादिः), विजिर् (विजिर् पृथग्भावे, जुहोत्यादिः),

स्वञ्ज् (ष्वञ्ज परिष्वङ्गे, भ्वादिः), सञ्ज् (षञ्ज सङ्गे, भ्वादिः) और सृज् (सृज विसर्गे,

दिवादिः) ये पन्द्रह धातुएँ अनुदात्त हैं।

दकारान्त धातुओं में- अद् (अद भक्षणे, अदादिः), क्षुद् (क्षुदिर् सम्पेषणे,

रुधादिः), खिद् (खिद दैन्ये, रुधादिः), तथा (खिद परिघाते, तुदादिः), छिद् (छिदिर्

द्वैधिकरणे, रुधादिः), तुद् (तुद व्यथने, तुदादिः), नुद् (णुद प्रेरणे, तुदादिः), पद्य (पद

गतौ, दिवादिः), भिद् (भिदिर् विदारणे, रुधादिः), विद्य (विद सत्तायाम्, दिवादिः), विनद्

(विद विचारणे, रुधादिः), विन्द् (विद्लृ लाभे, तुदादिः) शद् (शद्लृ शातने, भ्वादिः), सद्

(षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु (भ्वादिः), स्विद्य (जिष्विदा गात्रप्रक्षरणे, दिवादिः), स्कन्द्

(स्कन्दिर् गतिशोषणयोः, भ्वादिः) और हद् (हद पुरीषोत्सर्गे, भ्वादिः) ये सोलह धातुएँ

अनुदात्त हैं। पद्य, विद्य और स्विद्य में यकार दिवादिगण के निर्देश के लिए है। विनद् यह

रुधादिगण के लिए एवं विन्द् यह तुदादिगण के निर्देश के लिए है। इसी तरह एक ही धातु अनेक

गणों में हो तो अन्य गणीय धातु के निवारण के लिए श्यन् आदि के द्वारा निर्देश किया गया है।

धकारान्त धातुओं में क्रुध् (क्रुध क्रोधे, दिवादिः), क्षुध् (क्षुध बुभुक्षायाम्,

दिवादिः), बुध्य (बुध अवगमने, दिवादिः), बन्ध् (बन्ध बन्धने, क्र्यादिः), युध् (युध

सम्प्रहारे, दिवादिः), रुध् (रुधिर् आवरणे, रुधादिः) तथा (रुध कामे, दिवादिः), राध्

(राध संसिद्धौ, स्वादिः), तथा (राध वृद्धौ, दिवादिः), व्यध् (व्यध ताडने, दिवादिः), शुध्

(शुध शौचे, दिवादिः), साध् (साध संसिद्धौ, स्वादिः) और सिध्य (षिधु संसिद्धौ, दिवादिः)

ये ग्यारह धातुएँ अनुदात्त हैं। यहाँ पर दिवादिगणीय ग्रहण करने के लिए बुध् और सिध्

धातुओं में श्यन् प्रत्ययान्त निर्देश किया गया है।

नकारान्त धातुओं में- मन्य (मन ज्ञाने, दिवादिः) और हन् (हन हिंसागत्योः,

अदादिः) ये दो धातु अनुदात्त हैं। मन्य में श्यन् निर्देश है अर्थात् दिवादिगणीय ही मान्य हैं।

पकारान्त धातुओं में- आप् (आप्लृ व्याप्तौ, स्वादिः), तथा (आप्लृ लम्भने,

चुरादिः), क्षिप् (क्षिप प्रेरणे, तुदादिः), छुप् (छुप स्पर्शे, तुदादिः), तप् (तप सन्तापे,

भ्वादिः), तथा (तप ऐश्वर्ये, दिवादिः) तथा (तप दाहे, चुरादिः), तिप् (तिप क्षरणे,

भ्वादिः), तृप्य (तृप प्रीणने, दिवादिः), दृप्य (दृप हर्षमोहनयोः, दिवादिः), लिप् (लिप

उपदेहे, तुदादिः), लुप् (लुप्लृ छेदने, तुदादिः), वप् (डुवप बीजसन्ताने, भ्वादिः), शप्

(शप आक्रोशे, दिवादिः), स्वप् (जिष्वप् शये, अदादिः) और सृप् (सृष्लृ गतौ, भ्वादिः)

ये तरह धातुएँ अनुदात्त हैं।

भकारान्त धातुओं में- यभ् (यभ मैथुने, भ्वादिः), रभ् (रभ राभस्ये, भ्वादिः)

और लभ् (डुलभष् प्राप्तौ, भ्वादिः) ये तीन ही धातुएँ अनुदात्त हैं।

मकारान्त धातुओं में- गम् (गम्लृ गतौ, भ्वादिः), नम् (णम प्रह्लत्वे शब्दे च, भ्वादिः)

यम् (यमु उपरमे, भ्वादिः) और रम् (रमु क्रीडायाम्, भ्वादिः) ये चार धातुएँ अनुदात्त हैं।

शकारान्त धातुओं में- क्रुश् (क्रुश आह्वाने रोदने च, भ्वादिः), दश् (दश दशने,

भ्वादिः), दिश् (दिश अतिसर्जने, तुदादिः), दृश् (दृशिर प्रेक्षणे, भ्वादिः), मृश् (मृश

आमर्शने, तुदादिः), रिश्, रुश् (रुश रिश हिंसायाम्, तुदादिः) लिश् (लिश अल्पीभावे,

दिवादिः) तथा (लिश गतौ, तुदादिः), विश् (विश प्रवेशने, तुदादिः) और स्पृश् (स्पृश

संस्पर्शे, तुदादिः) ये दस धातुएँ अनुदात्त हैं।

षकारान्त धातुओं में- कृष् (कृष विलेखने, भ्वादिः), त्विष् (त्विष दीप्तौ,

भ्वादिः), तुष् (तुष प्रीतौ, दिवादिः), द्विष् (द्विष अप्रीतौ, अदादिः), दुष् (दुष वैकृत्ये,

दिवादिः), पुष्प्य (पुष पुष्टौ, दिवादिः), पिष् (पिष्लृ सञ्चूर्णने, रुधादिः), विष् (विष्लृ

व्याप्तौ) तथा (विषु सेचने, भ्वादिः) तथा (विष विप्रयोगे, क्र्यादिः), शिष् (शिष हिंसायाम्,

भ्वादिः) तथा (शिष्लृ विशेषणे, रुधादिः) एवं (शिष असर्वोपयोगे, चुरादिः), शुष् (शुष

शोषणे, दिवादिः) और शिलष्य (शिलष आलिङ्गने, दिवादिः) ये ग्यारह धातुएँ अनुदात्त हैं।

सकारान्त धातुओं में- घस् (घस्लृ अदने, भ्वादिः) और वस् (वस निवासे,

भ्वादिः) ये दो धातुएँ अनुदात्त हैं।

हकारान्त धातुओं में- दह् (दह भस्मीकरणे, भ्वादिः), दिह् (दिह उपचये,

अदादिः), दुह् (दुह प्रपूरणे, अदादिः), नह् (णह बन्धने, दिवादिः), मिह् (मिह सेचने,

भ्वादिः), रुह् (रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च, भ्वादिः), लिह् (लिह आस्वादने, अदादिः)

और वह् (वह प्रापणे, भ्वादिः) ये आठ धातुएँ अनुदात्त हैं।

इस तरह हलन्त धातुओं में एक सौ तीन (१०३) धातुएँ अनुदात्त हैं।

गोपायाञ्चकर्थ। गुप् धातु से अनुप्रयुज्यमान कृ धातु उपदेश अवस्था में एकाच् है और ऊढूदन्तैः० कारिका में न आने के कारण अनुदात्त है। अतः आर्धधातुक के परे एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् का निषेध हुआ। अतः गोपायाम्+चकृ+थ में इट् का आगम नहीं हुआ अपितु सार्वधातुकार्धधातुकयोः से ऋकार को गुण होकर अर् हुआ, गोपायाम्+चकर्+थ बना। मकार को अनुस्वार एवं परसवर्ण तथा रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर गोपायाञ्चकर्थ सिद्ध हुआ। इसी तरह उत्तमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन में भी इट् का निषेध होता है। अन्यत्र इट् की प्राप्ति ही नहीं है क्यों कि वलादि नहीं है। अतः इट् निषेध का भी प्रश्न नहीं है। इस तरह गुप् धातु के लिट् लकार में कृ का अनुप्रयोग होने पर रूप बने- गोपायाञ्चकार, गोपायाञ्चक्रतुः, गोपायाञ्चक्रुः, गोपायाञ्चकर्थ, गोपायाञ्चक्रथुः, गोपायाञ्चक्र, गोपायाञ्चकार-गोपायाञ्चकर, गोपायाञ्चकृव, गोपायाञ्चकृम।

गोपायाम् से भू का अनुप्रयोग होने पर गोपायाम् भू लिट् बना। अब जिस तरह से भू धातु से बभूव बनाया गया था, उसी तरह यहाँ भी वही प्रक्रिया होती है। इस तरह गोपायाम्+बभूव बन गया है। मकार को अनुस्वार और उसका परसवर्ण करने पर ब का सवर्णी मकार हो जाता है, जिससे गोपायाम्बभूव सिद्ध हो जाता है।

गोपायाम्बभूव, गोपायाम्बभूवतुः, गोपायाम्बभूवुः, गोपायाम्बभूविथ, गोपायाम्बभूवथुः, गोपायाम्बभूव, गोपायाम्बभूव, गोपायाम्बभूविव, गोपायाम्बभूविम। भू धातु के दीर्घ ऊकारान्त होने के कारण अनुदात्त नहीं है, अतः एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् का निषेध नहीं हुआ।

गोपायाम् से अस् का अनुप्रयोग होने पर अस्+लिट्, अस्+तिप्, अस्+णल्, अस्+अ, अस्अस्+अ, अअस्+अ, अत आदेः से दीर्घ होकर आअस्+अ, आ+अस् में सवर्णदीर्घ होकर आस्+अ, वर्णसम्मेलन होकर आस बना। गोपायाम्+आस में वर्णसम्मेलन होकर गोपायामास सिद्ध हुआ। गोपायामास, गोपायामासतुः, गोपायामासुः, गोपायामासिथ, गोपायामासथुः, गोपायामास, गोपायामास, गोपायामासिव, गोपायामासिम।

आयादय आर्धधातुके वा से आर्धधातुक की विवक्षा में आय विकल्प से हो रहा था। अभी तक आय आदेश के पक्ष के रूप बनाये गये। अब आय न होने के पक्ष में- जुगोप बनता है।

जुगोप। गुप् से आय न होने के पक्ष में लिट् लकार, तिप्, णल् आदेश, अनुबन्धलोप करके गुप्+अ बना है। गुप् को द्वित्व, गुप्गुप्+अ, हलादिशेष- गुप्गुप् अ, कुहोश्चुः से चुत्व करके जुगुप्+अ बना। पुगन्तलघूपधस्य च से उपधा को गुण होकर जुगोप्+अ, वर्णसम्मेलन होकर जुगोप सिद्ध हुआ। अपितु अर्थात् तिप्, सिप् और मिप् को छोड़कर अन्यत्र असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव होकर क्डिति च से गुण का निषेध होता है। जुगोप, जुगुपतुः, जुगुपुः ये रूप बने। थल् में अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है।