द्वित्वनिमित्तेऽचि अच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये।
गोपायाञ्चक्रतुः। गोपायाञ्चक्रुः।
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४७४- द्विर्वचनेऽचि। द्विरुच्यतेऽस्मिन् इति द्विर्वचनम्, अधिकरण अर्थ में ल्युट् प्रत्ययः। द्विर्वचने सप्तम्यन्तम्, अचि सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अचः परस्मिन् पूर्वविधौ से अचः की, स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ से आदेशः और न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वार-दीर्घजश्चर्विधिषु से न की अनुवृत्ति आती है।
द्वित्वनिमित्तक अच् को मानकर अच् के स्थान पर आदेश नहीं होता है, द्वित्व की कर्तव्यता में।
द्विवचन में गोपायाञ्चक्रु+अतुस् है। यहाँ पर लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व और इको यणचि से यण् एक साथ प्राप्त होते हैं। विप्रतिषेधे परं कार्यम् के अनुसार परकार्य के विधान होने से इको यणचि से यण् प्राप्त हो रहा है। यदि कृ को यण् पहले हो तो कर्+अतुस् बनेगा और इस स्थिति में अच् के न होने से लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व नहीं हो पायेगा, क्योंकि यह सूत्र एकाच् को द्वित्व करता है। अतः यण् को रोकने के लिए इस सूत्र की आवश्यकता है।
इस सूत्र से निषेध तव तक के लिए है जब तक कि द्वित्व नहीं होता। द्वित्व होने के बाद निषेध नहीं होता अर्थात् अजादेश करने वाले सूत्र लग सकते हैं।
गोपायाञ्चक्रतुः। द्विवचन में गोपायाम्+कृ+अतुस् में कृ को द्वित्व प्राप्त और ऋकार को यण् प्राप्त, विप्रतिषेधे परं कार्यम् के नियम से पहले यण् की प्राप्ति हो रही थी तो द्विर्वचनेऽचि से यह बताया कि जब द्वित्व की विवक्षा हो तो अन्य कोई भी आदेश पहले नहीं होंगे। अतः कृ को द्वित्व, उरत् से अत्व, उरण् रपरः से रपर करके कर् बना। हलादिशेष होने पर क बना, कुहोश्चुः से ककार के स्थान पर चुत्व होकर चकार बन गया। इस तरह गोपायाञ्चक्र+अतुस् बना। अब द्वित्व करने के बाद चक्र के ऋकार के स्थान पर इको यणचि से यण् होकर चकर् हुआ। गोपायाम्+चकर्+अतुस् में मकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके वर्णसम्मेलन और अतुस् के सकार को रुत्वविसर्ग करके गोपायाञ्चक्रतुः सिद्ध हुआ। इसी तरह बहुवचन में झि और उसके स्थान पर उस् आदेश करके गोपायाञ्चक्रः सिद्ध होता है।