Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 473
अदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
उरत्
Aṣṭādhyāyī 7.4.66
Vṛtti Varadarājācārya

अभ्यासऋवर्णस्य अत् प्रत्यये। रपरः। हलादिशेषः। वृद्धिः। गोपायाञ्चकार।

द्वित्वात् परत्वाद्यणि प्राप्ते-

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४७३- उरत्। उः षष्ठ्यन्तम्, अत् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।

प्रत्यय के परे होने पर अभ्यास के ऋवर्ण के स्थान पर अत् आदेश होता है।

अत् इस रूप में आदेश न होकर ह्रस्व अवर्ण आदेश है। अत् यह तपर-ग्रहण किया गया है। ऋवर्ण के स्थान पर प्राप्त होने के कारण उरण् रपरः से रपर होकर ऋ के स्थान पर अर् आदेश होगा।

अब गोपायाञ्चकार की प्रक्रिया को ध्यान से समझें क्योंकि इस प्रक्रिया की आवश्यकता बहुत होती है।

गोपायाञ्चकार। गुप् धातु से लिट् लकार के लाने की इच्छा में गुप्धूपविच्छिपणिपनिभ्य आय् से नित्य से प्राप्त आय प्रत्यय को बाधकर आयादय आर्धधातुके वा से विकल्प से आय हुआ। यहाँ पहले आय होने के पक्ष के ही रूप बनाये जा रहे हैं। जैसा कि पहले भी आप ने आय करने के बाद आर्धधातुकसंज्ञा, उपधागुण आदि प्रक्रिया की, वही प्रक्रिया यहाँ भी अपनाने से गोपाय बना। इसकी धातुसंज्ञा करके लिट् लकार आया। उसके स्थान पर तिप्, अनुबन्धलोप, उसके स्थान पर णल् आदेश, उसका भी

अनुबन्धलोप करने पर गोपाय+अ बना। कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि इस वार्तिक से आम् प्रत्यय, उसकी भी आर्धधातुकसंज्ञा करके गोपाय में अकार का अतो लोपः से लोप हुआ- गोपाय+आम्+अ बना। गोपाय+आम् में वर्णसम्मेलन होकर गोपायाम् बना। गोपायाम् से परे अ का आमः सूत्र से लुक् हुआ, गोपायाम् रह गया। मान्त कृदन्त होने प्रातिपदिकसंज्ञा करके आई हुई सु आदि विभक्तियों का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हुआ, क्योंकि यह मान्त कृदन्त होने से कृम्भेजन्तः से अव्ययसंज्ञक है। कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को साथ में लेकर पहले कृ धातु का अनुप्रयोग हुआ, गोपायाम् कृ लिट् बना। लिट् के स्थान पर तिप् आदेश, उसके स्थान णल् आदेश होकर गोपायाम्+कृअ बना। कृ का लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व हुआ, गोपायाम् कृ कृ अ बना। प्रथम कृ की पूर्वोऽभ्यासः से अभ्याससंज्ञा हुई और उरत् से ऋकार के स्थान अत् आदेश हुआ और उरण् रपरः की सहायता से रपर होकर अर् आदेश हुआ, गोपायाम् कर् कृ अ बना। हलादि शेषः से कर् में ककार का शेष और रकार का लोप हुआ। गोपायाम् ककृ अ बना। कुहोश्चुः से अभ्याससंज्ञक ककार के स्थान पर चवर्ग में च आदेश होकर गोपायाम् चकृ अ बना। गोपायाम् के मकार के स्थान पर मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और अनुस्वार के स्थान पर वा पदान्तस्य से वैकल्पिक परसवर्ण होकर ञकार आदेश हुआ तो गोपायाञ्चक्रु अ बना। णल् वाला अकार णित् है, अतः अचो ञ्णिति से गोपायाञ्चक्रु के ऋकार की वृद्धि हुई। उरण् रपरः की सहायता से ऋकार की वृद्धि आर् होती है। इस तरह से गोपायाञ्चकार+अ, वर्णसम्मेलन होकर गोपायाञ्चकार सिद्ध हुआ। परसवर्णाभाव पक्ष में गोपायांचकार भी सिद्ध होता है।

इस प्रक्रिया का बार-बार अभ्यास करें।