Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 472
कृष्वस्तीनामनुप्रयोजकं विधिसूत्रम्
कृञ् चानुप्रयुज्यते लिटि
Aṣṭādhyāyī 3.1.40
Vṛtti Varadarājācārya

आमन्ताल्लिट्पराः कृष्वस्तयोऽनुप्रयोज्यन्ते। तेषां द्वित्वादि।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४७२- कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि। कृञ् प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनुप्रयुज्यते तिङन्तपदं, लिटि सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि से विभक्ति बदलकर आमः की अनुवृत्ति आती है।

आमन्त धातु से परे लिट् लकार सहित कृ, भू और अस् इन धातुओं का अनुप्रयोग होता है।

कृञ् यह प्रत्याहार है। इसके अन्दर कृ, भू और अस् ये तीन धातुएँ आती हैं। जिस धातु से आम् का विधान किया गया, उस आमन्त धातु से परे लिट् लकार को साथ में लेकर कृ, भू और अस् ये तीन धातु बारी-बारी से अनुप्रयुक्त होते हैं अर्थात् इनका प्रयोग किया जाता है। स्मरण रहे कि आमन्त से परे लिट् सम्बन्धी अ का आमः से लुक् हो चुका है। अब कृ, भू और अस् का अनुप्रयोग होगा तो नये लिट् को लेकर ही होगा। कृ, भू, अस् के अनुप्रयोग होने पर भी धातु के अर्थ में कोई अन्तर नहीं होता।