Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 469
वैकल्पिकायाद्यादेशविधायकं सूत्रम्
आयादय आर्धधातुके वा
Aṣṭādhyāyī 3.1.31
Vṛtti Varadarājācārya

आर्धधातुकविवक्षायाम् आयादयो वा स्युः।

वार्तिकम्-कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि।

आस्कासोराम्बिधानान्मस्य नेत्त्वम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४६९- आयादय आर्धधातुके वा। आय आदौ येषां ते आयादयः। आयादयः प्रथमान्तम्, आर्धधातुके सप्तम्यन्तं, वा अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

आर्धधातुक प्रत्यय की विवक्षा में आय आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं।

आय आदि में तीन प्रत्यय होते हैं- आय, ईयङ् और णिङ्। आर्धधातुक की विवक्षा में ये विकल्प से होते हैं। लिट्, लुट्, लृट्, आशीर्लिङ्, लुङ् और लृङ् इन

लकारों में आर्धधातुक मिलता है, क्योंकि क्रमशः लिट्, तासि, स्य, लिङ्, च्लि, स्य की आर्धधातुकसंज्ञा होती है। उनकी कर्तव्यता हो तो यह सूत्र पहले ही आय आदि विकल्प से होने का विधान करता है। इससे प्रत्येक में दो-दो रूप होंगे- एक आय आदि के पक्ष में और एक आय आदि के अभाव में।

कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि। यह वार्तिक है। कास् और अनेकाच् धातु से आम् प्रत्यय होता है लिट् के परे होने पर।

यहाँ मकार की इत्संज्ञा नहीं होती है क्योंकि इस वार्तिक से आस् और कास् धातुओं से भी आम् का विधान किया गया है। कास् धातु से आम् हो और उसके मकार की इत्संज्ञा भी हो तो मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः के नियम से अन्त्य अच् के बाद ही आम् वाला आकार बैठेगा। का+आ+स् बनेगा। सवर्णदीर्घ होकर कास् ही बनेगा। अतः आम् का विधान व्यर्थ प्रतीत हुआ। इसी तरह दयायासश्च इस सूत्र के द्वारा आस् धातु से आम् का विधान होता है। यदि वहाँ पर मकार का लोप हो तो आ+आ+स्, में सवर्णदीर्घ करके आस् ही बनेगा। अतः आस् से भी आम् का विधान व्यर्थ हो जायेगा। ये व्यर्थ होकर यह ज्ञापित करते हैं कि इस प्रकरण में आम् प्रत्यय होने के बाद मकार की इत्संज्ञा नहीं होगी। जब मकार की इत्संज्ञा नहीं होगी तो मित् के अभाव में मिदचोऽन्त्यात्परः भी नहीं लगेगा और परश्च के नियम से आस्, कास्, गोपाय आदि से परे ही आम् होगा।

गोपाय से लिट्, उसके स्थान पर तिप्, उसके स्थान पर णल् आदेश, उसका अनुबन्धलोप करके गोपाय+अ बना था। कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि से आम् करके गोपाय+आम्+अ बना। आम् की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हो जाती है। ४७०- अतो लोपः। अतः षष्ठ्यन्तं, लोपः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अनुदात्तोपदेश-वनति-तनोत्यादीनामनुनासिकोलोपो झलि विङ्ति से एकदेश उपदेश की सप्तमी में परिवर्तित करके अनुवृत्ति आती है। आर्धधातुके का अधिकार है। उसकी दो बार आवृत्ति होती है। अङ्गस्य भी का अधिकार है।