Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 467
स्वार्थे आयुप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः
Aṣṭādhyāyī 3.1.28
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्य आयः प्रत्ययः स्यात् स्वार्थे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४६७- गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः। गुपूश्च धूपश्च विच्छिश्च पणिश्च पनिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गुपूधूपविच्छिपणिपनयः, तेभ्यो गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्यः। गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्यः पञ्चम्यन्तम्, आयः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से वचनविपरिणाम करके धातुभ्यः की अनुवृत्ति आती है।

गुपू, धूप, विच्छि, पणि और पनि इन धातुओं से स्वार्थ में आय-प्रत्यय होता है।

आय हलन्त नहीं, अदन्त है। अनिर्दिष्टार्थाः प्रत्ययाः स्वार्थे भवन्ति। किसी अर्थ विशेष को लिए विना अर्थात् अर्थनिर्देश के विना किये जाने वाले प्रत्यय स्वार्थ में होते हैं अर्थात् जिससे प्रत्यय हो रहा है, उसका जो अर्थ है, उसी अर्थ को बताते हैं, किसी विशेष अर्थ को नहीं। प्रकृत सूत्र से भी आय-प्रत्यय स्वार्थ में ही हुआ है। अतः धातुओं से किये गये आय का कोई विशेष अर्थ नहीं है।

गुपू से आय प्रत्यय होने के बाद गुपू+आय बना। धातु से विहित होने के कारण आर्थधातुकं शेषः से आय की आर्थधातुकसंज्ञा होती है और पुगन्तलघूपधस्य च से उपधाभूत उकार को गुण होकर ओकार होता है जिससे गोपू+आय=गोपाय बनता है। इसकी पुनः अग्रिम सूत्र से धातुसंज्ञा होती है।