हमयान्तस्य क्षणादेर्ण्यन्तस्य श्वयतेरेदितश्च वृद्धिर्नेडादौ सिचि।
अकटीत्। अकटिष्यत्। गुपू रक्षणे॥१२॥
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४६६- ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम्। ह् च, म् च य् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो ह्ययः, ह्ययः अन्ते येषां ते ह्ययान्ताः, एत् इत् यस्य स एदित्। ह्ययान्ताश्च, क्षणश्च, श्वसश्च, जागृ च, णिश्च, श्विश्च, एदित् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः, ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदितः, तेषाम् ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम्। ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् षष्ठ्यन्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु पूरे सूत्र की तथा नेटि से न की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।
इडादि सिच् के परे होने पर हकारान्त, मकारान्त और यकारान्त धातु तथा क्षण्, श्वस्, जागृ, णिच्प्रत्ययान्त धातु, श्वि एवं एदित् धातु रूप अङ्गों की वृद्धि नहीं होती है
यह सूत्र वदव्रलहलन्तस्याचः से नित्य से प्राप्त और अतो हलादेर्लघोः से विकल्प से प्राप्त वृद्धि का निषेध करता है। यहाँ प्रसंग में एदित् धातु कट् है। अन्य धातुओं का उदाहरण तत्तत्प्रकरणों में देखेंगे।
अकटीत्। कट् से लृङ् लकार, अट् का आगम, तिप्, इकार का लोप, शप् प्राप्त, उसे बाधकर च्लि और उसके स्थान पर सिच् आदेश अनुबन्धलोप, इट् का आगम, ईट् का आगम करके अकट्+इ+स्+ई+त् बना। वदव्रजहलन्तस्याचः से नित्य से प्राप्त वृद्धि को बाधकर अतो हलादेर्लघोः से विकल्प से प्राप्त थी, उसका ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् से निषेध होने पर इट ईटि से सकार का लोप और
सवर्णदीर्घ करके अकट्+ईत्, वर्णसम्मेलन होकर अकटीत् सिद्ध होता है। आगे अकटिष्टाम्, अकटिषुः, अकटीः, अकटिष्टम्, अकटिष्ट, अकटिषम्, अकटिष्व, अकटिष्म।
लृङ्- अकटिष्यत्, अकटिष्यताम्, अकटिष्यन् आदि।
गुपू रक्षणे। गुपू धातु रक्षा करना अर्थ में है। ऊकार की इत्संज्ञा होती है, गुपू बचता है। ऊदित् का फल वैकल्पिक इट् आदि करना है, जो आगे जाकर स्पष्ट होता है। गुपू से स्वार्थ में आय प्रत्यय होता है।