एषामचो वृद्धिः सिचि परस्मैपदेषु। अव्राजीत्। अव्रजिष्यत्।
कटे वर्षावरणयोः॥११॥
कटति। चकाट। चकटतुः। कटिता। कटिष्यति।
कटतु। अकटत्। कटेत्। कट्यात्।
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४६५- वदव्रजहलन्तस्याचः। वदश्च व्रजश्च हलन्तश्च तेषां समाहारद्वन्द्वो वदव्रजहलन्तम्, तस्य वदव्रजहलन्तस्य। वदव्रजहलन्तस्य षष्ठ्यन्तम्, अचः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सिचि वृद्धिः परस्मैदेषु यह पूरा सूत्र आता है और अङ्गस्य का अधिकार है।
वद, व्रज् और हलन्त धातुओं के अङ्ग के अवयव अच् की वृद्धि होती है, सिच् आदि में हो ऐसे परस्मैपद के परे होने पर।
इस सूत्र में प्रश्न यह आता है कि वद् और व्रज् धातु भी हलन्त ही हैं तो हलन्तस्याचः से काम चल जाता, वद् और व्रज् धातुओं का पृथक् ग्रहण क्यों किया गया? उत्तर यह है कि केवल हलन्त मात्र से इनका ग्रहण करने से इसे बाधकर अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक वृद्धि होती। उसे रोकने के लिए इन धातुओं का पृथक् ग्रहण किया गया है। विशेष रूप से विधानसामर्थ्यात् वैकल्पिक वृद्धि को बाधकर नित्य से वृद्धि होती है।
अव्राजीत्। व्रज् से लुङ्, अट् का आगम, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर च्लि, सिच् आदेश, अनुबन्धलोप, वलादिलक्षण इट् आगम, अस्तिसिचोऽपृक्ते से दीर्घ ईट् का आगम करने पर अव्रज्+इस्+ईत् बना है। ऐसी स्थिति में वदव्रजहलन्तस्याचः से व्रज् में अच् अकार है, उसकी वृद्धि हो गई- अव्राज्+इस्+ईत् बना। इट ईटि से सकार का लोप, सिन्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः इस वार्तिक की सहायता से अकः सवर्णे दीर्घः से सवर्णदीर्घ करके बन गया- अव्राजीत्।
वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि लुङ् के सभी रूपों में होगी किन्तु ईट् का आगम तिप्, सिप् में ही होता है, क्योंकि विद्यमान सिच् से परे अपृक्त हल् तिप् और सिप् में ही मिलेगा। अन्यत्र केवल ईट् आगम होगा और सकार के स्थान पर षत्व होकर यदि आगे तवर्ग है तो ष्टुत्व होगा और अच् वर्ण है तो वणसम्मेलन होगा। इस प्रकार से रूप बनेंगे- अव्राजीत्, अव्राजिष्टाम्, अव्राजिषुः। अव्राजीः, अव्राजिष्टम्, अव्राजिष्ट, अव्राजिषम्, अव्राजिष्व, अव्राजिष्म।
लृङ् में- अव्रजिष्यत्, अव्रजिष्यताम्, अव्रजिष्यन्। अव्रजिष्यः, अव्रजिष्यतम्, अव्रजिष्यत। अव्रजिष्यम्, अव्रजिष्याव, अव्रजिष्याम।
अब तक आप समझ गए होंगे कि यदि भू धातु में प्रयोग किए गए सभी सूत्र एवं भूधातु की सारी प्रक्रिया तैयार हो जाए तो आगे अन्य धातुओं की प्रक्रिया में सरलता होती है अर्थात् प्रक्रिया समझ में आती है, अन्यथा आगे के धातुओं में कठिनाई आयेगी।
कटे वर्षावरणयोः। कटे धातु बरसना और ढकना अर्थों में है। एकार की इत्संज्ञा होती है, अतः यह एदित् कहलाता है।
कटति। कटे में अनुबन्धलोप करके कट् बनने के बाद लट्, तिप्, शप् करके कटति, कटतः कटन्ति आदि रूप बनते हैं। लिट् में तिप्, णल्, अनुबन्धलोप, द्वित्व, हलादिशेष करके ककट्+अ, अभ्यास के ककार को कुहोश्चुः से चकार और उपधावृद्धि करके चकाट बनता है। आगे चकटतुः, चकटुः, चकटिथ आदि बनते हैं। लृट् में कटिता, कटितारौ, कटितारः आदि, लृट् में- कटिष्यति, कटिष्यतः, कटिष्यन्ति आदि, लोट् में कटतु-कटतात्, कटताम्, कटन्तु आदि, लृङ् में अकटत्, अकटताम्, अकटन् आदि, विधिलिङ् में- कटेत्, कटेताम्, कटेयुः आदि, आशीर्लिङ् में- कट्यात्, कट्यास्ताम्, कट्यासुः आदि रूप बनते हैं।