द्विहलो धातोर्दीर्घीभूतात्परस्य नुट् स्यात्। आनर्च। आनर्चतुः। अर्चिता।
अर्चिष्यति। अर्चतु। आर्चतु। अर्चेत्। अर्च्यात्। आर्चीत्। आर्चिष्यत्।
व्रज गतौ॥१०॥
व्रजति। व्रजाज। व्रजिता। व्रजिष्यति। व्रजतु। अव्रजत्।
व्रजेत्। व्रज्यात्।
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४६४- तस्मान्नुड् द्विहलः। द्वौ हलौ यस्य स द्विहल्, तस्य द्विहलः। तस्मात् पञ्चम्यन्तं, नुट् प्रथमान्तं, द्विहलः पष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है।
दो हल् वाले धातु के दीर्घीभूत अभ्यास के आकार से परे अङ्ग को नुट् का आगम होता है।
अतः आदेः के बाद इस सूत्र को पढ़ा गया है। अतः इस सूत्र के तस्मात् इस सर्वनामपद से पूर्व के प्रसंग को लिया जाता है। पूर्व सूत्र से अकार को दीर्घ होकर के आकार बन जाता है तो तस्मात् का अर्थ भी दीर्घीभूत आकार लिया जायेगा। नुट् में उकार और टकार की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल न् मात्र शेष बचता है।
आनर्च। अर्च् से लिट्, तिप्, णल्, अनुबन्धलोप होकर अर्च्+अ बना। अर्च् को द्वित्व करके हलादिशेष करने पर अअर्च्+अ बना। अभ्यास के अकार को अत आदेः से दीर्घ हो गया आअर्च्+अ बना। उस दीर्घीभूत आकार से परे अर्च् को तस्मान्नुड् द्विहलः से नुट् का आगम हुआ। नुट् में उकार और टकार की इत्संज्ञा हुई। टित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियम से आकार से परे अर्च् के आदि में बैठा- आ+न्+अर्च्+अ बना। वर्णसम्मेलन करने पर आनर्च् सिद्ध हुआ। इस तरह पूरे लिट् लकार में नुट् होकर रूप सिद्ध होते हैं। आनर्चतुः आदि में एत्व और अभ्यासलोप इस लिए नहीं हुआ कि अर्च् का अकार हल् के बीच में भी नहीं है और धातु में संयोग भी है।
लिट्- आनर्च, आनर्चतुः, आनर्चुः। आनर्चिथ, आनर्चथुः, आनर्च। आनर्च, आनर्चिव, आनर्चिम। लुट्- अर्चिता, अर्चितारौ, अर्चितारः। अर्चितासि, अर्चितास्थः, अर्चितास्थ। अर्चितास्मि, अर्चितास्वः, अर्चितास्मिः। लृट्- अर्चिष्यति, अर्चिष्यतः, अर्चिष्यन्ति। अर्चिष्यसि, अर्चिष्यथः, अर्चिष्यथ। अर्चिष्यामि, अर्चिष्यावः, अर्चिष्यामः। लोट्- अर्चतु-अर्चतात्, अर्चताम्, अर्चन्तु। अर्च-अर्चतात्, अर्चतम्, अर्चत। अर्चानि, अर्चाव, अर्चाम।
अजादि होने के कारण लङ्, लुङ्, लृङ् में अट् की जगह आट् का आगम होता है और आटश्च से वृद्धि होती है जिससे आर्चत्, आर्चीत्, आर्चिष्यत् आदि बनते हैं। लङ्- आर्चत्, आर्चताम्, आर्चन्। आर्चः, आर्चतम्, आर्चत। आर्चम्, आर्चाव, आर्चाम। विधिलिङ्- अर्चत्, अर्चताम्, अर्चेरन्। अर्चेः, अर्चेतम्, अर्चेत। अर्चेयम्, अर्चेव, अर्चेम। आशीर्लिङ्- अर्च्यात्, अर्च्यास्ताम्, अर्च्यासुः। अर्च्याः, अर्च्यास्तम्, अर्च्यास्त। अर्च्यासम्, अर्च्याव, अर्च्याम। लुङ्- आर्चीत्, आर्चिष्टाम्, आर्चिषुः। आर्चीः, आर्चिष्टम्, आर्चिष्ट। आर्चिषम्, आर्चिष्व, आर्चिष्म। लृङ्- आर्चिष्यत्, आर्चिष्यताम्, आर्चिष्यन्। आर्चिष्यः, आर्चिष्यतम्, आर्चिष्यत। आर्चिष्यम्, आर्चिष्याव, आर्चिष्याम।
व्रज गतौ। व्रज धातु गति अर्थ में है। जकारोत्तरवर्ती अकार की इत्संज्ञा होती है
और व्रज् शेष रहता है। इससे भी व्रजति आदि रूप बनते हैं। लिट् में व्रज् को द्वित्व। व्रजति= जाता है। लट्- व्रजति, व्रजतः, व्रजन्ति। व्रजसि, व्रजथः, व्रजथ। व्रजामि, व्रजावः, व्रजामः। लिट्- वव्राज, वव्रजतुः, वव्रजुः। वव्रजिथ, वव्रजथुः, वव्रज। वव्राज-वव्रज, वव्रजिव, वव्रजिम। लुट्- व्रजिता, व्रजितारौ, व्रजितारः। व्रजितासि, व्रजितास्थः, व्रजितास्थ। व्रजितास्मि, व्रजितास्वः, व्रजितास्मः। लृट्- व्रजिष्यति, व्रजिष्यतः, व्रजिष्यन्ति। व्रजिष्यसि, व्रजिष्यथः, व्रजिष्यथ। व्रजिष्यामि, व्रजिष्यावः, व्रजिष्यामः। लोट्- व्रजतु-व्रजतात्, व्रजताम्, व्रजन्तु। व्रज-व्रजतात्, व्रजतम्, व्रजत। व्रजानि, व्रजाव, व्रजाम। लङ्- अव्रजत्, अव्रजताम्, अव्रजन्। अव्रजः, अव्रजतम्, अव्रजत। अव्रजम्, अव्रजाव, अव्रजाम। विधिलिङ्- व्रजेत्, व्रजेताम्, व्रजेयुः। व्रजेः, व्रजेतम्, व्रजेत। व्रजेयम्, व्रजेव, व्रजेम। आशीर्लिङ्- व्रज्यात्, व्रज्यास्ताम्, व्रज्यासुः। व्रज्याः, व्रज्यास्तम्, व्रज्यास्त। व्रज्यासम्, व्रज्यास्व, व्रज्यास्म।