Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 463
नुमागमविधायकं विधिसूत्रम्
इदितो नुम् धातोः
Aṣṭādhyāyī 7.1.58
Vṛtti Varadarājācārya

नन्दति। ननन्द। नन्दिता। नन्दिष्यति। नन्दतु। अनन्दत्। नन्देत्। नन्द्यात्।

अनन्दीत्। अनन्दिष्यत्। अर्च पूजायाम्॥९॥

अर्चति।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४६३- इदितो नुम् धातोः। इत् इत् यस्य स इदित्, तस्य इदितः, बहुव्रीहिः। इदितः षष्ठ्यन्तं, नुम् प्रथमान्तं, धातोः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

इदित् धातु को नुम् का आगम होता है।

इत् अर्थात् ह्रस्व इकार, उसकी इत्संज्ञा जिस धातु में हुई है वह धातु इदित् हुआ। ऐसे धातु से नुम् का आगम करता है यह सूत्र। जैसे टुनदि समृद्धौ इस धातु में पहले टु की अदिर्जिटुडवः से इत्संज्ञा हुई और इकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा हुई, केवल नद् बचा। इकार की इत्संज्ञा होने के कारण यह धातु इदित् हुआ। अतः इस सूत्र से नुम् का आगम हुआ। नुम् में मकार और इकार इत्संज्ञक हैं, केवल न् ही बचा है। मकार की इत्संज्ञा होने के कारण यह मित् है। अतः मिद्योऽन्त्यात् परः १.१.४७ के नियम से मित् आगम अन्त्य अच् के बाद होता है तो अन्त्य अच् है नकारोत्तरवर्ती अकार, उसके बाद नुम् वाला नकार बैठा, नन्द् बना। अब नन्द् को ही धातु मानकर कार्य करेंगे।

नन्दिति। टुनदि में टु की इत्संज्ञा और इकार की इत्संज्ञा तथा दोनों का लोप करके नद् बचा। इदितो नुम्धातोः से नुम् का आगम होकर नन्द् बना है। अब इससे लट्, तिप्, शप् आदि करके नन्द्, अ ति बन जायेगा। वर्णसम्मेलन होकर नन्दिति बन जाता है।

लिट् में नन्द् बनके बाद- नन्द् लिट्, नन्द् तिप्, नन्द् णल्, नन्द् अ, नन्द् नन्द् अ, न नन्द् अ, वर्णसम्मेल करके ननन्द् बनेगा। नन्द् संयुक्त है अर्थात् नन्द् में संयोगसंज्ञा होने के कारण एत्वाभ्यासलोप नहीं हुआ।

संयोग के परे होने के कारण ह्रस्व न के अकार की गुरुसंज्ञा हुई है। लघुसंज्ञक न होने से अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक वृद्धि भी नहीं होगी। इस प्रकार से नन्द् (टुनदि) धातु के रूप निम्नानुसार बनते हैं-

लट्- नन्दिति, नन्दतः, नन्दन्ति। नन्दसि, नन्दथः, नन्दथ। नन्दामि, नन्दावः नन्दामः।

लिट्- ननन्द, ननन्दतुः, ननन्दुः। ननन्दिथ, ननन्दथुः, ननन्द। ननन्द, ननन्दिव, ननन्दिम।

लुट्- नन्दिता, नन्दितारौ, नन्दितारः। नन्दितासि, नन्दितास्थः, नन्दितास्थ, नन्दितास्मि, नन्दितास्वः, नन्दितास्मः। लृट्- नन्दिष्यति, नन्दिष्यतः, नन्दिष्यन्ति। नन्दिष्यसि, नन्दिष्यथः, नन्दिष्यथ। नन्दिष्यामि, नन्दिष्यावः, नन्दिष्यामः। लोट्- नन्दतु-नन्दतात्, नन्दताम्, नन्दन्तु। नन्द-नन्दतात्, नन्दतम्, नन्दत। नन्दानि, नन्दाव, नन्दाम। लङ्- अनन्दत्, अनन्दताम्, अनन्दन्। अनन्दः, अनन्दतम्, अनन्दत। अनन्दम्, अनन्दाव, अनन्दाम। विधिलिङ्- नन्देत्, नन्देताम्, नन्देयुः। नन्देः, नन्देतम्, नन्देत। नन्देयम्, नन्देव, नन्देम। आशीर्लिङ्- नन्द्यात्, नन्द्यास्ताम्, नन्द्यासुः। नन्द्याः, नन्द्यास्तम्, नन्द्यास्त। नन्द्यासम् नन्द्यास्व, नन्द्यास्म। लुङ्- अनन्दीत्, अनन्दिष्टाम्, अनन्दिषुः। अनन्दीः, अनन्दिष्टम्, अनन्दिष्ट। अनन्दिषम्, अनन्दिष्व, अनन्दिष्म। लृङ्- अनन्दिष्यत्, अनन्दिष्यताम्, अनन्दिष्यन्। अनन्दिष्यः, अनन्दिष्यतम्, अनन्दिष्यत। अनन्दिष्यम्, अनन्दिष्याव, अनन्दिष्याम।

अर्च पूजायाम्। अर्च धातु पूजा करना अर्थ में है। चकारोत्तरवर्ती अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है। अर्च बचता है।

अर्चति। अर्च से लट्, तिप्, शप्, अनुबन्धलोप करके अर्च+अ+ति बना। वर्णसम्मेलन होकर अर्चति सिद्ध हुआ। अर्च धातु के लट् के रूप- अर्चति, अर्चतः, अर्चन्ति। अर्चसि, अर्चथः, अर्चथ। अर्चामि, अर्चावः, अर्चामः।