Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 462
इत्संज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
आदिर्ञिटुडवः
Aṣṭādhyāyī 1.3.5
Vṛtti Varadarājācārya

टुनदि समृद्धौ।८॥

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उपदेशे धातोराद्या एते इतः स्युः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४६२- आदिर्जिटुडवः। जिश्च टुश्च डुश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो जिटुडवः। आदिः प्रथमान्तं, जिटुडवः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उपदेशेऽजनुनासिक इत् से उपदेशे और इत् की अनुवृत्ति आती है।

उपदेश अवस्था में धातु के आदि में विद्यमान जि, टु और डु इत्संज्ञक होते हैं।

उपदेश में जि, टु, डु धातुओं में ही मिलते हैं। अतः अर्थ में धातोः कहा गया। यहाँ पर उपदेश अवस्था में पठित टु है, अतः उसकी इस सूत्र से इत्संज्ञा हुई तो उसका तस्य

लोपः से लोप होकर नदि बचा। दकारोत्तरवर्ती इकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होकर लोप हुआ तो नद् बचा। इसके बाद आगे की प्रक्रिया होती है।