Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 461
एत्वाभ्यासविधायकं द्वितीयं सूत्रम्
थलि च सेटि
Aṣṭādhyāyī 6.4.121
Vṛtti Varadarājācārya

प्रागुक्तं स्यात्।

नेदिथ। नेदथुः। नेद। ननाद, ननद। नेदिव। नेदिम।नदिता। नदिष्यति।

नदतु। अनदतु। नदेतु। नद्यात्। अनादीत्, अनदीत्। अनदिष्यत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५६१- थलि च सेटि। इटा सहितः सेट्, तस्मिन्। थलि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, सेटि सप्तम्यन्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि यह सम्पूर्ण सूत्र अनुवृत्त होकर आता है।

लिट् लकार को निमित्त मानकर आदेश आदि न हुआ हो ऐसे अङ्ग के असंयुक्त हलों के मध्य में स्थित अत् अर्थात् ह्रस्व अकार के स्थान पर एकार आदेश और अभ्यास का लोप होता है, इट् से युक्त थल् के परे होने पर।

इसका अर्थ भी पूर्व सूत्र के समान है किन्तु विशेषता इतनी ही है कि वह कित् लिट् के परे रहने पर कार्य करता है और यह इट् से युक्त थल् के परे होने पर ही लगता है। इस सूत्र की आवश्यकता इस लिए पड़ी कि पूर्वसूत्र से थल् के परे रहने पर प्राप्त नहीं था, क्योंकि अपितु लिट् को कित् किया जाता है और कित् के परे होने पर ही वह लगता है। स्थानिवद्भाव से थल् भी पित् होता है। अतः किद्वद्भाव नहीं हो सकता।

नेदिथ। मध्यमपुरुष के एकवचन में सिप्, उसके स्थान पर थल्, अनुबन्धलोप, द्वित्व आदि कार्य करके न नद् थ में आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् का आगम करके न नद् इथ बना लिया गया। अब थलि च सेटि से एत्व और अभ्यास का लोप हुआ नेद् इथ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- नेदिथ।

थस्, थ, वस्, मस् में अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि से एत्व और अभ्यासलोप, वस् मस् में इट् आगम आदि कार्य होंगे। मिप् में णलुत्तमो वा लगाकर ननाद-ननद ये रूप बन जायेंगे। इस प्रकार से नद (णद) धातु के लिट् लकार में निम्नानुसार रूप बनेंगे। ननाद, नेदतुः, नेदुः। नेदिथ, नेदथुः, नेद। ननाद-ननद, नेदिव, नेदिम।

अब आप लुट् से लुङ् लकार तक के सारे रूपों की सिद्धि स्वयं करें। स्मरण रहे कि लुङ्-लकार में अतो हलादेर्लघोः से वृद्धि विकल्प से होकर अनादीत् और अनदीत् दो रूप बनेंगे। अन्यत्र गद्-धातु के समान ही रूप होंगे। हम यहाँ रूपों की तालिका दे रहे हैं, इनकी सिद्धि करना आपका काम है। यदि अभी तक आपने ठीक से प्रक्रिया को लगाया है तो कोई परेशानी नहीं आयेगी।

लुट् नदिता, नदितारौ, नदितारः। नदितासि, नदितास्थः, नदितास्थ, नदितास्मि, नदितास्वः, नदितास्मः। लृट्- नदिष्यति, नदिष्यतः, नदिष्यन्ति। नदिष्यसि, नदिष्यथः, नदिष्यथ। नदिष्यामि, नदिष्यावः, नदिष्यामः। लोट्- नदतु-नदतात्, नदताम्, नदन्तु। नद-नदतात्, नदतम्, नदत। नदानि, नदाव, नदाम। लङ्- अनदत्, अनदताम्, अनदन्। अनदः, अनदतम्, अनदत। अनदम्, अनदाव, अनदाम। विधिलिङ्- नदेत्, नदेताम्, नदेयुः। नदेः, नदेतम्, नदेत, नदेयम्, नदेव, नदेम। आशीर्लिङ्- नद्यात्, नद्यास्ताम्, नद्यासुः। नद्याः, नद्यास्तम्, नद्यास्त। नद्यासम्, नद्यास्व, नद्यास्म। लुङ्- वृद्धिपक्ष- अनादीत्, अनादिष्टाम्, अनादिषुः। अनादीः, अनादिष्टम्, अनादिष्ट। अनादिषम्, अनादिष्व, अनादिष्म। लुङ्- वृद्धि के अभाव पक्ष में- अनदीत्, अनदिष्टाम्, अनदिषुः। अनदीः, अनदिष्टम्, अनदिष्ट। अनदिषम्, अनदिष्व, अनदिष्म। लृङ्- अनदिष्यत्, अनदिष्यताम्, अनदिष्यन्। अनदिष्यः, अनदिष्यतम्, अनदिष्यत। अनदिष्यम्, अनदिष्याव, अनदिष्याम।

टुनदि समृद्धौ। टुनदि यह धातु समृद्धि होना अर्थ में है।