लिपिनमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्गं, तदवयवस्यासंयुक्तहल्मध्यस्थस्यात
एत्वमभ्यासलोपश्च किति लिटि। नेदतुः। नेदुः।
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४६०- अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि। एकः शब्दोऽसहायवाची। एकौ असंयुक्तौ हलौ,
तयोर्मध्यः एकहल्मध्यस्तत्र। आदेशः आदिर्यस्य स आदेशादिः, न आदेशादिरनादेशादिस्तस्य।
अतः षष्ठ्यन्तम्, एकहल्मध्ये सप्तम्यन्तम्, अनादेशादेः षष्ठ्यन्तं, लिटि सप्तम्यन्तम्।
गमहनजनखनघसां लोपः विङ्त्यनङि से किति और घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च से एत्
तथा अभ्यासलोपश्च की अनुवृत्ति आती है और अङ्गस्य का अधिकार है।
यहाँ लिटि की आवृत्ति होती है। एक में निमित्त सप्तमी है जो अनादेशादेः के
एकादेश आदेशादेः के साथ अन्वित होता है जिससे अर्थ बनता है- लिट् को निमित्त मान कर
आदेश न हुआ हो। दूसरा लिटि यह पद किति का विशेष्य है। अङ्गस्य में अवयव षष्ठी है।
लिट् लकार को निमित्त मानकर आदेश आदि न हुआ हो ऐसे अङ्ग के
असंयुक्त हलों के मध्य में स्थित अत् अर्थात् ह्रस्व अकार के स्थान पर एकार आदेश
और अभ्यास का लोप होता है, कित् लिट् के परे होने पर।
उसी धातु में यह सूत्र लगेगा जहाँ लिट् को निमित्त मानकर कोई आदेश न हुआ
हो और जो धातु का अवयव अकार हो, जो असंयुक्त अर्थात् संयोगसंज्ञा से रहित हलों के
बीच में बैठा हो। इस सूत्र के कार्य को एत्वाभ्यासलोप से जाना जाता है। इस सूत्र की प्रवृत्ति
में कारण हैं- १. लिट् को निमित्त मानकर धातु के स्थान पर कोई आदेश न हुआ हो, २.
धातु का अवयव ह्रस्व अकार ऐसा हो जो दोनों ओर से एक एक अर्थात् असंयुक्त हल् से घिरा हो, ३. धातु का अवयव ह्रस्व अकार हो और ४. कित् लिट् परे हो। णकारादि धातुओं को नकार आदेश लिट् को निमित्त मानकर नहीं होता अपितु लकार के आने के पहले ही होता है, अतः कोई बाधा नहीं है। तिप्, सिप् और मिप् में पकार की इत्संज्ञा होती है, अतः पित् है। पित् होने के कारण असंयोगाल्लिट् कित् से वह कित् नहीं बनता है। अतः सूत्र तिप्, सिप्, मिप् में नहीं लगता है, शेष में लगेगा।
नेदतुः। नेदुः। णद से नद् बनने के बाद लिट्, तस्, अतुस्, द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, हलादिशेष होकर न नद् अतुस् बना है। लिट्-लकार के स्थान पर हुए अतुस् को असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव हुआ। अब सूत्र लगा अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि। यहाँ पर लिट् लकार को आश्रय मानकर भिन्नरूप का कोई आदेश नहीं हुआ है। कित् लिट् अतुस् के परे रहते धातु में संयोग नहीं है। अतः अभ्याससंज्ञक न का लोप और द्वितीय नद् के नकारोत्तरवर्ती अकार के स्थान पर एकार आदेश होकर नेद्+अतुस् बना। वर्णसम्मेलन हुआ और सकार को रुत्वसिसर्ग हुआ नेदतुः। इसी प्रकार झि प्रत्यय लाकर उसके स्थान पर उस् आदेश करके एत्व और अभ्यासलोप करने पर नेदुः भी बन जायेगा।