Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 459
णत्वविधायकं विधिसूत्रम्
उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य
Aṣṭādhyāyī 8.4.14
Vṛtti Varadarājācārya

उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य णोपदेशस्य धातोर्नस्य णः।

प्रणदति। प्रणिनदति। नदति। ननाद।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४५९- उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य। न समासः असमासः, तस्मिन् असमासे, नञ्तत्पुरुषः। णः उपदेशे यस्य स णोपदेशः, तस्य णोपदेशस्य, षष्ठीतत्पुरुषः। उपसर्गात् पञ्चम्यन्तम्, असमासे सप्तम्यन्तम्, अपि अव्ययपदं, णोपदेशस्य षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। रषाभ्यां नो णः, अट्कुष्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि और उपसर्गात् की अनुवृत्ति ऊपर से आ रही है।

उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे णोपदेश धातु के नकार को णकार आदेश होता है।

प्रणदति। प्र-पूर्वक णद् धातु से प्रणदति बनता है। इसके पहले नदति बनाना

जरूरी है।

नदति। णद् धातु में अकार की इत्संज्ञा और णो नः से णकार के स्थान पर

नकारादेश करने के बाद नद् बन जाता है। उससे लट्, तिप्, शप्, वर्णसम्मेलन करके नदति

सिद्ध हो जाता है। नदति, नदतः, नदन्ति। नदसि, नदथः, नदथ। नदामि, नदावः, नदामः।

प्र उपसर्ग पूर्वक णद् धातु से भी यही प्रक्रिया करने पर प्र+नदति बना। णत्व के लिए

निमित्त प्र में रेफ है, अतः उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से नदति के नकार को णकार

होकर प्रणदति सिद्ध हुआ।

प्रणिनदति। प्र और नि इन दो उपसर्गों के लगने से प्रनि+नदति बना।

नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च से

द्वितीय उपसर्गस्थ नि के नकार को णत्व होकर प्रणिनदति सिद्ध हुआ। यहाँ धातु के नकार

को उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से इस कारण णत्व नहीं हुआ क्योंकि उपसर्ग में स्थित

निमित्त प्र के रेफ से धातु नकार के बीच में नि इस उपसर्ग के नकार का व्यवधान है। णत्व

के लिए निमित्त और निमित्ती के बीच में यदि व्यवधान हो तो अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और

नुम् का ही व्यवधान हो सकता है, अन्य वर्णों का नहीं।

ननाद। लिट्, तिप्, णल्, द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, हलादिशेष, अचो ञ्णिति से उपधा

की वृद्धि करके ननाद की सिद्धि होती है।