अभ्यासकवर्गहकारयोश्चवगदिशः।
अभ्यासकवर्गहकारयोश्चवगदिशः।
अभ्यासकवर्गहकारयोश्चवगदिशः।
४५४- कुहोश्चुः। कुश्च ह् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः कुहौ, तयोः कुहोः। कुहोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
अभ्यास में विद्यमान कवर्ग और हकार के स्थान पर चवर्ग आदेश होता है।
इस सूत्र से केवल अभ्यास में ही कार्य करने के कारण जहाँ-जहाँ द्वित्व होता है वहीं-वहीं प्रवृत्त होता है क्योंकि जहाँ द्वित्व होता है, अभ्यास भी वहीं मिलता है।
४५४- कुहोश्चुः। कुश्च ह् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः कुहौ, तयोः कुहोः। कुहोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
अभ्यास में विद्यमान कवर्ग और हकार के स्थान पर चवर्ग आदेश होता है।
इस सूत्र से केवल अभ्यास में ही कार्य करने के कारण जहाँ-जहाँ द्वित्व होता है वहीं-वहीं प्रवृत्त होता है क्योंकि जहाँ द्वित्व होता है, अभ्यास भी वहीं मिलता है।
४५४- कुहोश्चुः। कुश्च ह् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः कुहौ, तयोः कुहोः। कुहोः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
अभ्यास में विद्यमान कवर्ग और हकार के स्थान पर चवर्ग आदेश होता है।
इस सूत्र से केवल अभ्यास में ही कार्य करने के कारण जहाँ-जहाँ द्वित्व होता है वहीं-वहीं प्रवृत्त होता है क्योंकि जहाँ द्वित्व होता है, अभ्यास भी वहीं मिलता है।