उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य नेर्नस्य णो गदादिषु परेषु। प्रणिगदति।
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उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य नेर्नस्य णो गदादिषु परेषु। प्रणिगदति।
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उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य नेर्नस्य णो गदादिषु परेषु। प्रणिगदति।
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४५३- नेर्गद-नद-पत-पद-घु-मा-स्यति-हन्ति-याति-वाति-द्राति-प्साति-वपति-वहति-शाम्यति-चिनोति-देग्धिषु च। गदश्च नदश्च पतश्च पदश्च घुश्च माश्च स्यतिश्च हन्तिश्च यातिश्च वातिश्च द्रातिश्च प्सातिश्च वपतिश्च वहतिच शाम्यतिश्च चिनोतिच देग्धिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धयः, तेषु गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु। नेः पञ्चम्यन्तं, गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि इस पूरे सूत्र की तथा रषाभ्यां नो णः समानपदे से रषाभ्यां, नः, णः की एवञ्च उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से उपसर्गात् की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्गस्थ निमित्त( रेफ, षकार और ऋकार ) से परे नि उपसर्ग के नकार को णत्व होता है गद, नद, पत, पद, घुसंज्ञक धातु, मा, षो, हन्, या, वा, द्रा, प्सा, वप, वह, शम्, चि, दिह् इन धातुओं के परे होने पर।
यह उक्त धातुओं के परे होने पर उपसर्गों में स्थित रेफ और षकार हो और उसके बाद द्वितीय उपसर्ग नि हो तो उसी नि के नकार को णत्व करता है। जैसे गदति के पहले प्र और नि उपसर्ग लगने पर प्रनि+गदति है। इस सूत्र से णत्व होने पर प्रणिगदति बन गया। इसी तरह प्रनि+नदति=प्रणिनदति, प्रनि+पतति=प्रणिपतति इत्यादि। आगे प्रणिजगाद, प्रणिगदिता इत्यादि भी समझना चाहिए।
४५३- नेर्गद-नद-पत-पद-घु-मा-स्यति-हन्ति-याति-वाति-द्राति-प्साति-वपति-वहति-शाम्यति-चिनोति-देग्धिषु च। गदश्च नदश्च पतश्च पदश्च घुश्च माश्च स्यतिश्च हन्तिश्च यातिश्च वातिश्च द्रातिश्च प्सातिश्च वपतिश्च वहतिच शाम्यतिश्च चिनोतिच देग्धिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धयः, तेषु गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु। नेः पञ्चम्यन्तं, गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अट्कुप्वाङ्नुम्यवायेऽपि इस पूरे सूत्र की तथा रषाभ्यां नो णः समानपदे से रषाभ्यां, नः, णः की एवञ्च उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से उपसर्गात् की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्गस्थ निमित्त( रेफ, षकार और ऋकार ) से परे नि उपसर्ग के नकार को णत्व होता है गद, नद, पत, पद, घुसंज्ञक धातु, मा, षो, हन्, या, वा, द्रा, प्सा, वप, वह, शम्, चि, दिह इन धातुओं के परे होने पर।
यह उक्त धातुओं के परे होने पर उपसर्गों में स्थित रेफ और षकार हो और उसके बाद द्वितीय उपसर्ग नि हो तो उसी नि के नकार को णत्व करता है। जैसे गदति के पहले प्र और नि उपसर्ग लगने पर प्रनि+गदति है। इस सूत्र से णत्व होने पर प्रणिगदति बन गया। इसी तरह प्रनि+नदति=प्रणिनदति, प्रनि+पतति=प्रणिपतति इत्यादि। आगे प्रणिजगाद, प्रणिगदिता इत्यादि भी समझना चाहिए।
४५३- नेर्गद-नद-पत-पद-घु-मा-स्यति-हन्ति-याति-वाति-द्राति-प्साति-वपति-वहति-शाम्यति-चिनोति-देग्धिषु च। गदश्च नदश्च पतश्च पदश्च घुश्च माश्च स्यतिश्च हन्तिश्च यातिश्च वातिश्च द्रातिश्च प्सातिश्च वपतिश्च वहतिच शाम्यतिश्च चिनोतिच देग्धिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धयः, तेषु गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु। नेः पञ्चम्यन्तं, गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अट्कुप्वाड्नुम्व्यवायेऽपि इस पूरे सूत्र की तथा रषाभ्यां नो णः समानपदे से रषाभ्यां, नः, णः की एवञ्च उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से उपसर्गात् की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्गस्थ निमित्त( रेफ, षकार और ऋकार ) से परे नि उपसर्ग के नकार को णत्व होता है गद, नद, पत, पद, घुसंज्ञक धातु, मा, षो, हन्, या, वा, द्रा, प्सा, वप, वह, शम्, चि, दिह इन धातुओं के परे होने पर।
यह उक्त धातुओं के परे होने पर उपसर्गों में स्थित रेफ और षकार हो और उसके बाद द्वितीय उपसर्ग नि हो तो उसी नि के नकार को णत्व करता है। जैसे गदति के पहले प्र और नि उपसर्ग लगने पर प्रनि+गदति है। इस सूत्र से णत्व होने पर प्रणिगदति बन गया। इसी तरह प्रनि+नदति=प्रणिनदति, प्रनि+पतति=प्रणिपतति इत्यादि। आगे प्रणिजगाद, प्रणिगदिता इत्यादि भी समझना चाहिए।