Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 451
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
पुगन्तलघूपधस्य च
Aṣṭādhyāyī 7.3.86
Vṛtti Varadarājācārya

पुगन्तस्य लघूपधस्य चाङ्गस्येको गुणः सार्वधातुकार्धधातुकयोः।

धात्वादेरिति सः। सेधति। षत्वम्। सिषेध।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

हलोऽनन्तराः संयोगः से दो या दो से अधिक हलों के बीच में यदि अच् न हो तो उस हल-समूह की संयोगसंज्ञा होती है, यह भी संज्ञाप्रकरण में बताया जा चुका है। ऐसे संयोग के परे होने पर पूर्व में जो ह्रस्व वर्ण है, उसकी गुरुसंज्ञा होती है, न कि संयोग की। जैसे पत्रम् में तूर् इन दो वर्णों के बीच में कोई अच् नहीं है, अतः यह संयोग है। इसके परे होने पर प में अकार की गुरुसंज्ञा हुई।

४५१- पुगन्तलघूपधस्य च। पुक् अन्ते यस्य तत् पुगन्तम्, लघ्वी उपधा यस्य तद् लघूपधम्, पुगन्तञ्च लघूपधञ्च तयोः समाहारद्वन्द्वः पुगन्तलघूपधम्, तस्य पुगन्तलघूपधस्य। पुगन्तलघूपधस्य षष्ठ्यन्तं च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है और मिदेर्गुणः से गुणः एवं सार्वधातुकार्धधातुकयोः इस सूत्र की अनुवृत्ति आती है। इको गुणवृद्धी इस परिभाषा-सूत्र से इकः यह षष्ठ्यन्त पद उपस्थित होता है।

सार्वधातुक और आर्धधातुक के परे होने पर पुक् प्रत्यय अन्त में हो ऐसे अङ्ग के इक् और लघुसंज्ञक वर्ण उपधा में हो ऐसे अङ्ग के इक् को गुण होता है।

पुक् एक आगम है और उपधा एक संज्ञा है जो अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा से विहित होती है तथा लघु भी संज्ञा ही है, जो ह्रस्व की होती है। तिङन्तप्रकरण में सामान्यतया गुण करने के लिए सार्वधातुकार्धधातुकयोः और पुगन्तलघूपधस्य च ये ही दो सूत्र प्रसिद्ध हैं। पूर्वसूत्र इक् अन्त में हो तो गुण करता है और यह सूत्र इक् उपधा में हो तो गुण करता है (पुक् प्रत्ययान्त अङ्ग के इक् को भी करता है)। स्मरण रहे कि अन्त्य वर्ण से पूर्व के वर्ण की उपधासंज्ञा होती है। ऐसा वर्ण लघु अर्थात् ह्रस्व भी होना चाहिए।

सेधति। षिध धातु में पहले तो धकारोत्तरवर्ती अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा हुई और तस्य लोपः से लोप हुआ। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होने पर सिध् बना है। उससे लट्-लकार, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, सिध्+अ+ति बना। सिध् में अन्त्य वर्ण है ध्, उससे पूर्व के वर्ण सि में इकार की उपधासंज्ञा हुई, इसलिए लघूपध है सि का इकार, सार्वधातुक परे है शप् वाला अकार। इस प्रकार से सि में इकार को पुगन्तलघूपधस्य च से गुण हुआ। इकार को गुण ए होकर सेध् बना। सेध्+अ+ति में वर्णसम्मेलन हुआ- सेधति।

इसी प्रकार से सेधति, सेधतः, सेधन्ति, सेधसि, सेधथः, सेधथ, सेधामि, सेधावः, सेधामः बनायें।

सिषेध। षिध से सिध् बनने के बाद लिट्-लकार, तिप्, णल् आदेश, अनुबन्ध लोप, सिध् अ बना, लिट् च से आर्धधातुकसंज्ञा, लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व, सिध् सिध्+अ, पूर्वोऽभ्यासः से अभ्याससंज्ञा, हलादि शेषः से प्रथम सिध् के धकार का लोप और सकार शेष रहा, सि सिध् अ बना। आर्धधातुक के परे रहने पर सिध् में इकार को पुगन्तलघूपधस्य च से गुण, सि सेध् अ, प्रथम सि में इण् है इकार, उससे परे द्वितीय सेध् के सकार के स्थान पर आदेशप्रत्यययोः से षत्व होकर सि षेध् अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- सिषेध सिद्ध हुआ।