संयोगे परे ह्रस्वं गुरु स्यात्।
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४४९- संयोगे गुरु। संयोगे सप्तम्यन्तं, गुरु प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। ह्रस्वं लघु से ह्रस्वं की अनुवृत्ति आती है।
संयोग के परे रहने पर पूर्वस्थ ह्रस्व अच् गुरुसंज्ञक होता है।