हेतु-हेतुमद्भावादि लिङ्निमित्तं तत्र भविष्यत्यर्थे लृङ् स्यात् क्रियाया अनिष्पत्तौ गम्यमानायाम्।
अभविष्यत्। अभविष्यताम्। अभविष्यन्। अभविष्यः। अभविष्यतम्।
अभविष्यत। अभविष्यम्। अभविष्याव। अभविष्याम।
सुवृष्टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत्, इत्यादि ज्ञेयम्।
४४२- लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ। लिङ्ः निमित्तं लिङ्निमित्तम्, तस्मिन् लिङ्निमित्ते, षष्ठीतत्पुरुषः॥ क्रियायाः अतिपत्ति क्रियातिपत्तिः, तस्याम् क्रियातिपत्तौ, षष्ठीतत्पुरुषः। लिङ्निमित्ते सप्तम्यन्तं, लृङ् प्रथमान्तं, क्रियातिपत्तौ सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भविष्यति मर्यादावचनेऽवरस्मिन् से भविष्यति की अनुवृत्ति आती है।
लिङ् के निमित्त जो हेतु-हेतुमद्भाव आदि, उसमें क्रिया का भविष्यत्काल में होना (प्रकट करना) हो तो धातु से लृङ् लकार होता है क्रिया की असिद्धि गम्यमान होने पर।
हेतु कारण को कहते हैं। हेतुरस्यास्तीति हेतुमत्, कारण जिसका है वह अर्थात् कारण वाले कार्य को हेतुमत् कहते हैं। हेतुहेतुमतोर्भावः=हेतुहेतुमद्भावः, (षष्ठीतत्पुरुषः)। कार्य-कारण के असाधारण धर्मविशेष को अर्थात् कार्यकारणभाव को ही हेतुहेतुमद्भाव कहा जाता है। हेतुहेतुमद्भावः आदिर्यस्य तद् (निमित्तम्) हेतुहेतुमद्भावादि। कार्यकारणभाव आदि में जिसके ऐसे निमित्त को हेतुहेतुमद्भावादि कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ हेतुहेतुमद्भावरूप सम्बन्ध रहता है, वहाँ हेतुहेतुमतोर्लिङ् इस सूत्र से लिङ् लकार होता है। जैसे- कृष्णं नमेत् चेत् सुखं यायात् अर्थात् कृष्ण को नमन करे तो सुख प्राप्त करे। इस हेतुमत् कहा जाता है। इस प्रकार यहाँ दोनों क्रियाओं में हेतुहेतुमद्भाव रूप सम्बन्ध है। इस प्रकार का सम्बन्ध जहाँ दो क्रियाओं में रहता है वहाँ पर सामान्यतः हेतुहेतुमतोर्लिङ् सूत्र से लिङ् लकार होता है परन्तु जब हेतुहेतुमद्भाव आदि सम्बन्ध होने पर भविष्यत्काल और क्रिया की असिद्धि प्रतीत होती हो तो हेतु और हेतुमत् दोनों क्रियाओं में लृङ् लकार होता है। जैसे सुवृष्टिश्चेदभविष्यत् तदा सुभिक्षमभविष्यत् यदि अच्छी वृष्टि होगी तो सुकाल होगा। यहाँ सुवृष्टि होना क्रिया हेतु तथा सुभिक्ष होना क्रिया हेतुमत् कार्य है। अतः दोनों में लृङ् लकार हुआ।
इस तरह हेतु और हेतुमान् भाव का तात्पर्य कार्यकारणभाव ही समझना चाहिए।
जैसे ईटे होंगी तो मकान बन जायेगा। परिश्रम से पढ़ोगे तो परीक्षा में उत्तीर्ण होगे। इन वाक्यों में यह दीखता है कि यदि कारण होगा तो कार्य भी होगा। हेतु विद्यमान रहेगा तो हेतुमान् अर्थात् उससे होने वाला कार्य भी सिद्ध हो जायेगा आदि। अब इन वाक्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि कार्य अभी नहीं हुआ है अर्थात् क्रिया की सिद्धि नहीं हुई है। इसमें भविष्यत्काल होना चाहिए। जैसे अच्छी वृष्टि अर्थात् वर्षा होगी तो अनाज भी अच्छा होगा। हेतु-हेतुमद्भाव तो भूतकाल और वर्तमान काल में भी होते हैं किन्तु इस सूत्र की प्रवृत्ति में हेतु-हेतुमद्भाव के होते हुए भविष्यत्काल का होना आवश्यक है।
अभविष्यत्। अभविष्यताम्। अभविष्यन्। अभविष्यः। अभविष्यतम्। अभविष्यत। अभविष्यम्। अभविष्याव। अभविष्याम। हेतु-हेतुमद्भाव और क्रिया की अनिष्पत्ति अर्थ गम्यमान होने पर भविष्यत्काल में लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ से लृङ् लकार का विधान हुआ, लृङ् लृङ् लृङ् क्ष्वदुदात्तः से अट् का आगम, अनुबन्धलोप होकर लकार के स्थान पर प्रथमपुरुष का एकवचन तिप् आया, भू ति बना, होकर अभू ति बना। ति की सार्वधातुकसंज्ञा होकर कर्तरि शप् से शप् प्राप्त था, उसे बाधकर स्यतासी लृलुटोः से स्य हुआ। स्य की आर्धधातुक शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् का आगम हुआ, अभू इ स्य ति बना। भू को गुण अवादेश होकर अभवि स्य ति बना। स्य के सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व करके अभविष्यति बना, ति में इकार का इतश्च से लोप हुआ तो अभविष्यत् सिद्ध हुआ।
लृङ् लकार के सम्बन्ध में मोटामोटी रूप में यह समझें कि यह लकार लगभग लृट् लकार जैसा ही है, उससे विशेषता यह है कि धातु के पहले अट् का आगम होता है और ति, झि, सि में इतश्च से इकार का लोप होता है तथा तस्, थस्, थ, मिप् के स्थान पर ताम्, तम्, त, अम् ये आदेश एवं वस्, मस् में नित्यं डितः से सकार का लोप ये कार्य विशेष होते हैं। इस तरह मोटे तौर पर यह कहें कि भविष्यति अट् का आगम और इकार का लोप करके अभविष्यत् बना लें। इसी तरह अभविष्यताम्, अभविष्यन्, अभविष्यः, अभविष्यतम्, अभविष्यत, अभविष्यम्, अभविष्याव, अभविष्याम भी बना लें।
इस तरह से आपने भू धातु के दसों लकारों के रूप बना लिए। एक लकार में नौ रूप हैं तो दस लकारों के नब्बे रूप हो गये। इस तरह प्रत्येक धातु के १०-१० रूप बनते हैं। यदि धातु उभयपदी अर्थात् परस्मैपदी और आत्मनेपदी है तो रूप दो गुने हो जायेंगे। इस तरह १८० होंगे। उसमें भी कई धातुओं में अनेक कार्यों में वैकल्पिक रूप बनते हैं। इस तरह रूपों की संख्या और बढ़ जाती है। फिर आगे णिजन्त में लगभग २००, सन्नन्त में लगभग २००, यङन्त में लगभग २००, यङ्लुङन्त में लगभग २०० करके एक धातु के हजार से भी ऊपर रूप बन जाते हैं।
इसके बाद उपसर्ग भी लगते हैं। २२ उपसर्ग हैं, उनमें अधिकतर धातु के साथ जुड़ते हैं। कहीं एक ही उपसर्ग धातु से जुड़ता है तो कहीं एक से अधिक दो, तीन भी लगते हैं। कहीं वे ही उपसर्ग व्यत्यास अर्थात् आगे, पीछे होकर लगते हैं। इस तरह एक धातु के लाखों भी रूप हो सकते हैं। एक धातु को अच्छी तरह से समझ लिया जाय तो हजारों, लाखों शब्दों को समझा जा सकता है।
इस लिए मैं छात्रों से बारम्बार कहता हूँ कि आप जो पढ़ रहे हैं, उसे अच्छी तरह
भू-धातु लोट् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
भवतु, भवतात्
भवताम्
भवन्तु
मध्यमपुरुष
भव, भवतात्
भवतम्
भवत
उत्तमपुरुष
भवानि
भवाव
भवामः
भू-धातु लङ् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अभवत्
अभवताम्
अभवन्
मध्यमपुरुष
अभवः
अभवतम्
अभवत
उत्तमपुरुष
अभवम्
अभवाव
अभवाम
भू-धातु विधिलिङ् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
भवेत्
भवेताम्
भवेयुः
मध्यमपुरुष
भवेः
भवेतम्
भवेत
उत्तमपुरुष
भवेयम्
भवेव
भवेम
भू-धातु आशीर्लिङ् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
भूयात्
भूयास्ताम्
भूयासुः
मध्यमपुरुष
भूयाः
भूयास्तम्
भूयास्त
उत्तमपुरुष
भूयासम्
भूयास्व
भूयास्म
भू-धातु लृङ् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अभूत्
अभूताम्
अभूवन्
मध्यमपुरुष
अभूः
अभूतम्
अभूत
उत्तमपुरुष
अभूवम्
अभूव
अभूम
भू-धातु लृङ् लकार
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अभविष्यत्
अभविष्यताम्
अभविष्यन्
मध्यमपुरुष
अभविष्यः
अभविष्यतम्
अभविष्यत
उत्तमपुरुष
अभविष्यम्
अभविष्याव
अभविष्याम
उपसर्गों के सम्बन्ध में
उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते। प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत्॥
उपसर्ग से धातु का अर्थ बदल जाता है। जैसे हृ-धातु से हार बनता है, इसका अर्थ है हरण करना, ले जाना। इसमें प्र उपसर्ग को जोड़ने पर प्रहार करना अर्थात् किसी के प्रति आक्रमण करना अर्थ हो जाता है। इसी प्रकार आ उपसर्ग के लगने से आहार=खाना, सं-उपसर्ग के लगने से संहार अर्थात् विनाश करना, वि-उपसर्ग के लगने से विहार अर्थात् घूमना और परि-उपसर्ग के लगने से परिहार अर्थात् हटाना या रोकना, ऐसा अर्थ बन जाता
है। तिङन्त में हू-धातु का हरति ऐसा रूप बनता है। इसमें उपसर्गों को धातु से पहले जोड़ने पर प्रहरति, आहरति, संहरति, विहरति और परिहरति रूप बनते हैं। इनका अर्थ पूर्वोक्त ही है।
भू धातु से भवति आदि रूप बनते हैं। इसके पहले उपसर्गों को जोड़ने से प्र+भवति=प्रभवति, सम्भवति, परिभवति, पराभवति, अनुभवति आदि रूप बन जाते हैं। उपसर्ग के लगने से धातु के अर्थ बदल जाने के कारण प्रभवति=समर्थ होता है, सम्भवति=सम्भव होता है, परिभवति=अपमानित होता है, पराभवति=पराजित करता है और अनुभवति=अनुभव करता है आदि अर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक धातु के प्रत्येक लकार के प्रत्येक पुरुष और वचन में ये उपसर्ग लग सकते हैं। जिस प्रकार आपने भू-धातु के दसों लकारों में १० रूप बनाये, उसी प्रकार से मात्र एक उपसर्ग के जुड़ने से १० रूप और बन जाते हैं। हाँ, इस बात का ध्यान जरूर रखना कि लङ्-लुङ्-लृङ् लकारों में अट् एवं आट् का आगम होता है तो वहाँ पर उपसर्गों का प्रयोग अट्-आट् से पहले ही करना तथा वहाँ कोई यण्, गुण आदि सन्धि प्राप्त है तो सन्धि भी करनी चाहिए। जैसे अनु+भू के लङ् लकार में अनु+अभवत्, यण् होकर के अन्वभवत् एवं प्र+अभवत्, दीर्घ होकर के प्राभवत् आदि रूपों को बनाना चाहिए। कहीं कहीं रेफ और षकार वाले उपसर्ग से परे धातु का नकार हो तो उसका णत्व भी हो जाता है और कहीं कहीं धातु के सकार के स्थान पर षकार आदेश भी होता है। इसके लिए विशेष सूत्र वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में मिलेंगे।
हम यहाँ पर अनु-उपसर्ग लगे भू-धातु के रूप दिखा रहे हैं। आगे आप इसी प्रकार से और भी उपसर्गों को लगाकर रूप बनाने का प्रयास करें।
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( वर्तमान काल लट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभवति
अनुभवतः
अनुभवन्ति
मध्यमपुरुष
अनुभवसि
अनुभवथः
अनुभवथ
उत्तमपुरुष
अनुभवामि
अनुभवावः
अनुभवामः
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( परोक्ष, अनद्यतन भूतकाल, लिट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुबभूव
अनुबभूवतुः
अनुबभूवुः
मध्यमपुरुष
अनुबभूविथ
अनुबभूवथुः
अनुबभूव
उत्तमपुरुष
अनुबभूव
अनुबभूविव
अनुबभूविम
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( अनद्यतन भविष्यत्काल, लुट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभविता
अनुभवितारौ
अनुभवितारः
मध्यमपुरुष
अनुभवितासि
अनुभवितास्थः
अनुभवितास्थ
उत्तमपुरुष
अनुभवितास्मि
अनुभवितास्वः
अनुभवितास्म
..... अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( सामान्य भविष्यत्काल, लृट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभविष्यति
अनुभविष्यतः
अनुभविष्यन्ति
मध्यमपुरुष
अनुभविष्यसि
अनुभविष्यथः
अनुभविष्यथ
उत्तमपुरुष
अनुभविष्यामि
अनुभविष्यावः
अनुभविष्यामः
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( आज्ञार्थक, लोट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभवतु, अनुभवतात्
अनुभवताम्
अनुभवन्तु
मध्यमपुरुष
अनुभव, अनुभवतात्
अनुभवतम्
अनुभवत
उत्तमपुरुष
अनुभवानि
अनुभवाव
अनुभवाम
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( अनद्यतन भूतकाल लृट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अन्वभवत्
अन्वभवताम्
अन्वभवन्
मध्यमपुरुष
अन्वभवः
अन्वभवतम्
अन्वभवत
उत्तमपुरुष
अन्वभवम्
अन्वभवाव
अन्वभवाम
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( विध्यर्थक, विधिलिङ् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभवेत्
अनुभवेताम्
अनुभवेयुः
मध्यमपुरुष
अनुभवेः
अनुभवेतम्
अनुभवेत
उत्तमपुरुष
अनुभवेयम्
अनुभवेव
अनुभवेम
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( आशीर्लिङ् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अनुभूयात्
अनुभूयास्ताम्
अनुभूयासुः
मध्यमपुरुष
अनुभूयाः
अनुभूयास्तम्
अनुभूयास्त
उत्तमपुरुष
अनुभूयासम्
अनुभूयास्व
अनुभूयास्म
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( सामान्य भूतकाल, लृट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अन्वभूत्
अन्वभूताम्
अन्वभूवन्
मध्यमपुरुष
अन्वभूः
अन्वभूतम्
अन्वभूत
उत्तमपुरुष
अन्वभूवम्
अन्वभूव
अन्वभूम
अनु-उपसर्ग पूर्वक भू-धातु ( हेतु-हेतुमद्भावादि, लृट् लकार )
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमपुरुष
अन्वभविष्यत्
अन्वभविष्यताम्
अन्वभविष्यन्
मध्यमपुरुष
अन्वभविष्यः
अन्वभविष्यतम्
अन्वभविष्यत
उत्तमपुरुष
अन्वभविष्यम्
अन्वभविष्याव
अन्वभविष्याम
आपने अब तक भू-धातु के दसों लकारों के रूपों की सिद्धि और उपसर्ग के प्रयोग के विषय में जाना। अब एक बार पूरी आवृत्ति करके निम्नलिखित अभ्यास भी करिये।
अभ्यासः
१- धातु और शब्दों में आप क्या अन्तर पाते हैं?
२- कौन कौन लकार किस काल और किन अर्थों में होते हैं?
३- किस-किस लकार में सार्वधातुकसंज्ञा और किस-किस लकार में आर्धधातुकसंज्ञा होती है?
४- किन-किन स्थितियों में प्रथम-मध्यम-उत्तमपुरुषों का प्रयोग होता है?
५- कहाँ आत्मनेपद का प्रयोग होता है और कहाँ परस्मैपद या कहाँ उभयपद का? स्पष्ट करें।
६- किन-किन लकारों में अट् का आगम होता है?
७- लिट् और लङ् लकार में क्या अन्तर है?
८- लुट् और लृट् लकार में आप क्या अन्तर पाते हैं?
९- अद्यतन और अनद्यतन के विषय में बताइये।
१०- एक बार भू धातु के सारे रूप मौखिक ही सिद्ध करें।
११- अपनी कापी में प्र-उपसर्ग लगाकर भू धातु के सारे रूप लिखिये।
१२- भ्वादि में अभी तक आपने जितने सूत्र पढ़े, वे वृत्ति-अर्थ सहित आपको कण्ठस्थ हैं क्या? नहीं तो उनको कण्ठस्थ करें।
.....