Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 443
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
अत आदेः
Aṣṭādhyāyī 7.4.70
Vṛtti Varadarājācārya

अत सातत्यगमने॥२॥ अतति।

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अभ्यासस्यादेरतो दीर्घः स्यात्।

आत। आततुः। आतुः। आतिथ। आतथुः। आत। आत। आतिव

आतिम। आतिता। आतिष्यति। आततु।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अत सातत्यगमने। अत धातु निरन्तर चलना अर्थ में है। अतति= चलता ही रहता है। अत में तकारोत्तरवर्ती अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप होता है। अत् शेष रह जाता है। भू में ऊकार की इत्संज्ञा इसलिए नहीं हुई कि उसमें अनुनासिकत्व नहीं है पर अत में अकार अनुनासिक है। इसलिए उसकी अनुनासिक मानकर इत्संज्ञा हुई।

अतति। अत सातत्यगमने धातु है। त में अकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा हुई और तस्य लोपः से लोप हुआ। इससे लट् लकार, तिप् आदेश, अनुबन्धलोप, ति की सार्वधातुकसंज्ञा और कर्तरि शप् से शप्, अनुबन्धलोप करके अत्+अ+ति बना, वर्णसम्मेलन होकर अतति सिद्ध हुआ। यहाँ इगन्त न होने के कारण गुण नहीं हुआ। अब आगे तस् आदि में भी इसी प्रकार से रूप बनाइये। तस्, थस्, वस्, मस् में सकार को रुत्वविसर्ग, झि में अन्त् आदेश, मिप्, वस् मस् में अतो दीर्घो यजि से दीर्घ करके अतति, अततः, अतन्ति, अतसि, अतथः, अतथ, अतामि, अतावः अतामः सिद्ध हो जाते हैं।

४४३- अत आदेः। अतः षष्ठ्यन्तम्, आदेः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य और दीर्घः इणः किति से दीर्घः की अनुवृत्ति आती है।

अभ्यास में विद्यमान आदि ह्रस्व अकार को दीर्घ होता है।

यद्यपि अत् धातु के अभ्यास को इस सूत्र से दीर्घ होने पर भी और न होने पर भी समान ही रूप बनते हैं, तथापि अर्च आदि धातुओं से आनर्च आदि बनाने के लिए इस सूत्र की आवश्यकता होती है। यह सूत्र यहाँ पर भी प्रवृत्त हो सकता है। अतः न्यायसंगति से यहाँ पर ही दिखाया गया है।

अत। अत् से लिट्, तिप्, अनुबन्धलोप, परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः से णल् आदेश, अनुबन्धलोप, अत् अ बना, लिटि धातोरनभ्यासस्य से धातु को द्वित्व, अत् अत् अ बना। अभ्याससंज्ञा और हलादि शेषः से हलादिशेष होकर अ अत् अ बना, अभ्याससंज्ञक अ का अत आदेः से दीर्घ करने पर आ अत् अ बना। आ+अत् में अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ होकर अत् अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- आत बना। इसी प्रकार आत् बनाते जाइये और आगे तस् आदि के स्थान पर अतुस् आदि आदेश करके उसमें मिलाते जाइये। इस प्रकार से आततुः, आतुः, आतिथ (इट् आगम करके), आतथुः, आत, आत, आतिव, आतिम बनते हैं।

याद रहे कि तिप् आदि नौ के स्थान पर परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः से णल् आदि नौ आदेश होते हैं और थल्, वस्, मस् के परे रहने पर आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इट् का आगम होता है।

अतिता। अत् से लुट् लकार, तिप् आदेश, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर स्यतासी लृलुटोः से तासि, अनुबन्धलोप, उसकी आर्धधातुकसंज्ञा, आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् का आगम, अत् इ तास् ति बना, लुटः प्रथमस्य डारौरसः से डा आदेश, तास् में आस् इस टि का लोप कर के अत्+इ+त्+आ बना, वर्णसम्मेलन करके अतिता बना। पूरे लुट् लकार में इट् का आगम होगा, गुण प्राप्त ही नहीं है। शेष विधि भू-धातु के समान ही है। इस प्रकार से लुट् में अत् के रूप बनते हैं- अतिता, अतितारौ, अतितारः, अतितासि, अतितास्थः, अतितास्थ, अतितास्मि, अतितास्वः, अतितास्मः।

अतिष्यति। अत् से लृट् लकार, उसके स्थान पर तिप् आदेश, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर स्यतासी लृलुटोः से स्य, उसकी आर्धधातुकसंज्ञा, आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् का आगम करके अत् इ स्य ति बना, वर्णसम्मेलन होकर अतिस्यति बना, इकार से परे स्य के सकार को आदेशप्रत्यययोः से पत्व हुआ- अतिष्यति। अब इसी प्रकार आगे भी बनाते जाइये। स्य प्रत्यय और इट् का आगम करके इस प्रकार से लृट् में अत् के रूप बनते हैं- अतिष्यति, अतिष्यतः, अतिष्यन्ति, अतिष्यसि, अतिष्यथः, अतिष्यथ, अतिष्यामि, अतिष्यावः, अतिष्यामः।

अततु। अत् से लोट्, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, अत् अ ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ और भवतु के समान एकः से उत्व करके अततु बना। तु को तुद्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से एक पक्ष में तातङ् आदेश होकर अततात् भी बनता है। यदि भू-धातु के सारे लकारों के रूप याद हैं तो बनाने में कोई कठिनाई नहीं होगी, अन्यथा समझ में नहीं आयेगा। इस प्रकार से लोट्-लकार में अत् के रूप बनते हैं- अततु-अततात्, अतताम्, अतन्तु, अत-अततात्, अततम्, अतत, अतानि, अताव, अताम। तिप् और सि में विकल्प से तातङ् आदेश होकर दो-दो रूप बनते हैं।