Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 441
अडाटोर्निषेधकं विधिसूत्रम्
न माङ्योगे
Aṣṭādhyāyī 6.4.74
Vṛtti Varadarājācārya

अडाटौ न स्तः। मा भवान् भूत्। मा स्म भवत्। मा स्म भूत्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४४१- न माङ्योगे। माङ्योगे माङ्योगस्तस्मिन्। न अव्ययपदं, माङ्योगे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः से अट् और आडजादीनाम् से आट् की अनुवृत्ति आती है।

माङ् इस अव्यय के योग में अट् और आट् आगम नहीं होते।

मा भवान् भूत्। मा स्म भवत्। मा स्म भूत्। ये तीनों माङि लुङ् और स्मोत्तरे लङ् च के उदाहरण हैं। माङ् में ऊकार की इत्संज्ञा होकर केवल मा बचा है। उसके योग

में लृङ् और स्म उत्तर वाले माङ् के योग में लृङ् और लृङ् दोनों लकार हुए हैं। उक्त तीनों स्थलों पर लृङ्लृङ्लृङ्क्षवदुदात्तः से अट् आगम की प्राप्ति थी, उसका न माङ्योगे से निषेध हुआ है। इस तरह भूत् यह लृङ् में और भवत् यह लृङ् में अट् रहित तिप् के रूप हैं। इसी तरह सभी तिप्, तस् आदि प्रत्ययों के परे समझना चाहिए।