भू सू एतयोः सार्वधातुके तिङि परे गुणो न।
अभूत्। अभूताम्। अभूवन्। अभूः। अभूतम्। अभूत। अभूवम्। अभूव।
अभूम।
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४४०- भूसुवोस्तिङि। भूश्च सूश्च भूसुवौ, तयोर्भूसुवोः। भूसुवोः षष्ठ्यन्तं, तिङि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से न और सार्वधातुके की तथा मिदेर्गुणः से गुणः की अनुवृत्ति आती है।
सार्वधातुक तिङ् के परे रहने पर भू और सू धातु के इक् को गुण न हो।
अभूत्। भू धातु से सामान्य भूत अर्थ में लुङ् से लुङ् लकार का विधान हुआ, लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वदुदात्तः से भू धातु को अट् का आगम, लकार के स्थान पर प्रथमपुरुष का एकवचन तिप् आदेश, अनुबन्धलोप, टित् होने के कारण भू के आदि में बैठा, अभू ति बना। ति की सार्वधातुकसंज्ञा, कर्तरि शप् से शप् की प्राप्ति, उसको बाधकर च्लि लुङि से च्लि प्रत्यय, च्लि में चकार की चुट् से इत्संज्ञा, उसके बाद लोप, उच्चारणार्थक इकार के स्वतः चले जाने से ल् के स्थान पर च्लेः सिच् से सिच् आदेश, अनुबन्धलोप, अभू स् ति बना। (सिच् के सकार की आर्थधातुकं शेषः से आर्थधातुकसंज्ञा होती है। जिसका भू धातु
में कोई प्रयोजन नहीं है, अन्यत्र प्रयोजन है) सिच् के सकार का गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से लुक् अर्थात् लोप हो गया, अभू ति बना। ति सार्वधातुक के परे रहने पर भू के ऊकार के स्थान पर सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण प्राप्त था उसको भूसुवोस्तिङि ने निषेध कर दिया। अभू ति में ति के इकार का इतश्च से लोप हुआ- अभूत् बना।
अभूताम्। प्रथमपुरुष के द्विवचन में भी यही विधि होगी। उसमें तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से तस् के स्थान पर ताम् आदेश करना चाहिए और ताम् प्रत्यय में इकार न होने के कारण इतश्च की प्रवृत्ति नहीं है। शेष कार्य अभूत् की तरह करके अभूताम् सिद्ध करें। भू लुङ्, अभू लुङ्, अभू तस्, अभू ताम्, अभू च्लि ताम्, अभू स् ताम्, अभू ताम्, अभूताम्।
अभूवन्। लुङ् लकार में अच् परे हो तो भुवो वुग् लुङ्लिटोः से वुक् का आगम होता है। झि के स्थान पर अन्त् आदेश होने पर तथा मिप् के स्थान पर अम् आदेश होने पर अच् मिलता है। अतः इन दोनों जगह में इस सूत्र से वुक् का आगम होगा। वुक् में ककार और उकार की इत्संज्ञा होकर केवल व् ही शेष रहता है और वह कित् होने के कारण भू के अन्त में बैठता है। शेष कार्य अभूत् की तरह ही है। अभू झि, अभू अन्ति, अभूव् अन्ति, अभूव् स् अन्ति, अभूव् अन्ति, अभूवन्ति, अभूवन् त्, तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप होकर अभूवन् बना।
अभूः। मध्यमपुरुष के एकवचन में अभूत् की तरह ही अभूः बनता है। अन्तर केवल इतना ही है कि सि के इकार का इतश्च से लोप होने के बाद सकार को रुत्व और विसर्ग होता है।
अभूतम्। अभूत। मध्यमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन में ये दो रूप अभूताम् की तरह ही बनते हैं अर्थात् धातु से लकार, अट् आगम और तिङ् आदेश के बाद सार्वधातुकसंज्ञा, च्लि, सिच्, सकार का लोप आदि यथावत् ही होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि अभूताम् में तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से ताम् आदेश होता है और यहाँ पर क्रमशः तम् और त आदेश होते हैं।
अभूवम्। उत्तमपुरुष में मिप् के स्थान पर तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से अम् आदेश करके शेष प्रक्रिया अभूवन् की तरह ही होती है।
अभूव। अभूम। उत्तमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन वस् और मस् में सकार का नित्यं ङितः से लोप करना न भूलें। शेष प्रक्रिया पूर्ववत् ही है।