Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 439
सिचो लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु
Aṣṭādhyāyī 2.4.77
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यः सिचो लुक् स्यात्। गापाविहेणादेशपिबती गृह्येते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४३९- गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु। गातिश्च स्थाश्च घुश्च पाश्च भूश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो गातिस्थाघुपाभुवः, तेभ्यो गातिस्थाघुपाभूभ्यः, गातिस्थाघुपाभूभ्यः पञ्चम्यन्तं, सिचः षष्ठ्यन्तं, परस्मैपदेषु सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ण्यक्षत्रियार्षजितो यूनि लुगणिजोः से लुक् की अनुवृत्ति आती है।

इण्धातु के स्थान पर हुए गा-धातु, स्था-धातु, घु-संज्ञक-धातु, पाधातु और भू-धातु से परे सिच् का लुक् होता है।

एक स्वतन्त्र गा-धातु भी है, उसे सूत्रस्थ गा से न लेने के लिए इणादेश गा धातु कहा गया अर्थात् इस सूत्र में इण् धातु के स्थान पर होने वाला गा धातु ही ग्राह्य है, स्वतन्त्र गा-धातु या अन्य धातु के स्थान पर होने वाला ग्राह्य नहीं है। दा-रूप और धा-रूप धातुओं की घुसंज्ञा दाधाध्वदाप् सूत्र से हो होती है, उन घुसंज्ञक धातु का ग्रहण है। इसी प्रकार एक स्वतन्त्र पा धातु भी है, किन्तु इस सूत्र में पिब आदेश होने वाला पा धातु ही ग्राह्य है। इसके लिए महाभाष्य प्रमाण है।