इचावितौ।
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४३८- च्लेः सिच्। च्लेः षष्ठ्यन्तं, सिच् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
च्लि के स्थान पर सिच् आदेश होता है।
सिच् में चकार की हलन्त्यम् से तथा इकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होती है और दोनों का तस्य लोपः से लोप हो जाता है।
यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि च्लि के स्थान पर सिच् होता ही है तो सीधे सिच् प्रत्यय ही क्यों न किया जाय? च्लि लुङि और च्लेः सिच् इन दो सूत्र के बदले केवल सिच् लुङि पढ़ने पर भी काम हो जाता है? उत्तर संक्षेप में यह है कि आचार्य च्लि के स्थान पर जैसे सिच् करते हैं, उसी प्रकार आगे कहीं चङ्, कहीं, अङ् और कहीं क्स
आदेश का भी विधान करते हैं। वहाँ पर बाध्यबाधकभाव से अनेक भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। अतः सिच्, चङ्, अङ्, क्सः आदि के एक कोई स्थानी का होना आवश्यक है। एतदर्थ च्लि ऐसा सामान्य प्रत्यय करके सिच् आदि आदेशों का विधान किया है। इस बात को आप वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में अच्छी तरह समझेंगे।