शबाद्यपवादः।
४३७- च्लि लुङि। च्लि प्रथमान्तं, लुङि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से धातोः की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
लुङ् लकार के परे होने पर धातु से च्लि प्रत्यय होता है।
यह शप् आदि का अपवाद है। चकार की चुटू से इत्संज्ञा हो जाती है, लि का इकार उच्चारणार्थक है। अतः केवल ल् बचता है।