स्मोत्तरे माङि लङ् स्याच्चाल्लुङ्।
४३६- स्मोत्तरे लङ् च। स्म उत्तरो यस्मात्, स्मोत्तरम्, तस्मिन् स्मोत्तरे। माङि लुङ् से माङि की अनुवृत्ति आती है और धातोः, प्रत्ययः, परश्च अधिकार पहले से ही आ रहा है।
स्म परे हो ऐसे माङ्-शब्द के उपपद होने पर धातु से लङ् और लुङ् लकार होते हैं।
सूत्र में च पढ़े जाने के कारण लुङ् लकार भी होता है, यह अर्थ होता है।