Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 423
अडागमविधायकं विधिसूत्रम्
लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः
Aṣṭādhyāyī 6.4.71
Vṛtti Varadarājācārya

एष्वङ्गस्याद्।

एष्वङ्गस्याट्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४२३- लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः। लुङ् च लङ् च लृङ् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो लुङ्लङ्लृङ्कः, तेषु लुङ्लङ्लृङ्क्षु। लुङ्लङ्लृङ्क्षु सप्तम्यन्तम्, अट् प्रथमान्तम्, उदात्तः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। यहाँ पर अङ्गस्य का अधिकार है।

लुङ्, लङ्, लृङ् के परे रहने पर धातु-रूप अङ्ग को अट् आगम का होता है।

अट् में टकार की इत्संज्ञा होती है, टित् होने के कारण धातु के आदि में बैठता है। यह सूत्र स्वर का भी विधान करता है- जो अट् हो वह उदात्त स्वर वाला हो। किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वर का विधान दिखाया नहीं गया है।

४२३- लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः। लुङ् च लङ् च लृङ् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो लुङ्लङ्लृङ्कः, तेषु लुङ्लङ्लृङ्क्षु। लुङ्लङ्लृङ्क्षु सप्तम्यन्तम्, अट् प्रथमान्तम्, उदात्तः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। यहाँ पर अङ्गस्य का अधिकार है।

लुङ्, लङ्, लृङ् के परे रहने पर धातु-रूप अङ्ग को अट् आगम का होता है।

अट् में टकार की इत्संज्ञा होती है, टित् होने के कारण धातु के आदि में बैठता है। यह सूत्र स्वर का भी विधान करता है- जो अट् हो वह उदात्त स्वर वाला हो। किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वर का विधान दिखाया नहीं गया है।