ते गत्युपसर्गसंज्ञा धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्याः।
४१९- ते प्राग्धातोः। ते प्रथमान्तं, प्राक् अव्ययपदं, धातोः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
उन गतिसंज्ञकों और उपसर्गसंज्ञकों का धातु से पहले ही प्रयोग होता है।
अष्टाध्यायी में उपसर्गाः क्रियायोगे, गतिश्च आदि सूत्रों से जिनकी गतिसंज्ञा हुई है, उनको इस सूत्र में ते(वे) से निर्देश किया गया है। उनका प्रयोग कहाँ हो? धातु के पहले हो या धातु के बाद हो? अव्यवधान में ही हो या व्यवधान होने पर भी हो? इस पर यह सूत्र निर्णय देता है कि धातु से अव्यवहित पूर्व में ही हो। जैसे- प्र+हरति=प्रहरति, आ+हरति=आहरति, अनु+भवति= अनुभवति इत्यादि। वेद में छन्दसि परेऽपि एवं व्यवहिताश्च इत्यादि सूत्रों के द्वारा धातु से पर में और व्यवधान होने पर भी ये गति और उपसर्ग लग जाते हैं।