Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 418
आडागमविधायकं विधिसूत्रम्
आडुत्तमस्य पिच्च
Aṣṭādhyāyī 3.4.92
Vṛtti Varadarājācārya

लोडुत्तमस्याद् स्यात् पिच्च। हिन्योरुत्वं न, इकारोच्चारणसामर्थ्यात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४१८- आडुत्तमस्य पिच्च। आड् प्रथमान्तम्, उत्तमस्य षष्ठ्यन्तं, पित् प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। लोटो लङ्वत् से लोटः की अनुवृत्ति आती है।

लोट् लकार के उत्तमपुरुष को आट् का आगम होता है और वह आट् सहित उत्तमपुरुष पित् के समान होता है।

उत्तमपुरुष में केवल मिप् तो पित् है किन्तु वस्, मस् पित् नहीं हैं। इनको भी पित् के समान हो जाने का अतिदेश यह सूत्र कर रहा है। आट् में टकार की इत्संज्ञा होगी और टित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियमानुसार प्रत्यय के आदि में होगा।

यहाँ भ्वादिगण में यदि आट् का आगम न भी होता तो भी अतो दीर्घो यजि से दीर्घ होकर भवानि, भवाव, भवाम आदि रूप सिद्ध हो जाते, कोई दोष न आता किन्तु अदादिगण, जुहोत्यादिगण आदि में इस सूत्र की नितान्त आवश्यकता पड़ेगी, जिससे अदानि, अदाव, अदाम, जुहवानि आदि रूप सिद्ध हो सकेंगे। इसलिए न्यायवशात् यहाँ पर भी इस सूत्र की प्रवृत्ति दिखाई गई है।

हिन्योरुत्वं न, इकारोच्चारणसामर्थ्यात्। मि और नि के इकार को एरुः से उत्व

नहीं होता क्योंकि यदि उकार आदेश ही करना होता तो नि के स्थान पर नु का उच्चारण और हि के स्थान पर हु का उच्चारण करते।

भवानि। भू धातु से लोट् लकार, उसके स्थान पर उत्तमपुरुष का एकवचन मिप् आया। अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, मेर्निः से मि के स्थान पर नि आदेश और आडुत्तमस्य पिच्च से आट् का आगम, गुण, अवादेश करने पर भव+आनि वना और अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ होकर भवानि सिद्ध हुआ।