Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 420
णत्वविधायकं विधिसूत्रम्
आनि लोट्
Aṣṭādhyāyī 8.4.16
Vṛtti Varadarājācārya

उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य लोडादेशस्यानीत्यस्य नस्य णः स्यात्। प्रभवाणि।

वार्तिकम्- दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्वप्रतिषेधो वक्तव्यः। दुःस्थितिः। दुर्भवानि।

वार्तिकम्- अन्तःशब्दस्याङ्किविधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम्। अन्तर्भवाणि।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४२०- आनि लोट्। आनि लुप्तषष्ठीकं पदं, लोट् इत्यपि लुप्तषष्ठीकं पदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य से उपसर्गात् की, अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि इस सम्पूर्ण सूत्र की रषाभ्यां नो णः समानपदे से रषाभ्यां, नः और णः की अनुवृत्ति आती है।

उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे लोट् लकार के आनि के नकार को णकार आदेश होता है।

णत्वविधायक सूत्र अष्टाध्यायी के अष्टमाध्याय के चतुर्थपाद में हैं। रषाभ्यां नो णः समानपदे, अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि इन सूत्रों से णत्व का प्रकरण प्रारम्भ होता है। नकार को णकार होने में रेफ और षकार को निमित्त माना गया है। इनसे परे नकार को णकार होता है। ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् इस वार्तिक से ऋकार को भी णत्व के लिए निमित्त माना गया है। इस तरह णत्व होने के लिए पूर्व में रेफ या षकार अथवा ऋकार होना चाहिए। जिस णत्वविधायक सूत्र में 'उपसर्गस्थ निमित्त' ऐसा पढ़ा गया हो, उससे यही समझना चाहिए कि नकार से पहले विद्यमान रेफ, षकार और ऋकार। अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि के अनुसार यदि निमित्त(रेफ, षकार और ऋकार) से स्थानी(नकार) के बीच किसी का

व्यवधान हो तो अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् का ही हो सकता है, अन्य का नहीं। इनके व्यवधान न होने पर तो णत्व होता ही है। आनि लोट् यह सूत्र लोट् लकार के मिप् में नि आदेश और आट् आगम होकर आनि बनने के बाद ही लगता है।

प्रभवाणि। प्र+भू से पहले आप भवानि बना लें। प्र+भवानि बन गया है। यहाँ उपसर्ग है-प्र, णत्व का निमित्त है प्र का रेफ, उससे परे नकार है भवानि में आनि का नकार। रेफ और नकार के बीच अ+भ+अ+व्+आ=अभवा का व्यवधान है। ये सभी वर्ण अट् और पवर्ग के बीच में आते हैं। अतः इनके व्यवधान में णत्व के लिए कोई बाधा नहीं है। फलतः नकार को णत्व हो गया- प्रभवाणि।

दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्वप्रतिषेधो वक्तव्यः। यह वार्तिक है। षत्व और णत्व विधि करनी हो तो दुर् का उपसर्गत्व निषेध होता है, ऐसा कहना चाहिए। यह उपसर्गत्व का निषेधक वार्तिक है। धातु के योग में दुर् की उपसर्गाः क्रियायोगे से उपसर्गसंज्ञा होती है किन्तु जहाँ षत्व या णत्व करना है वहाँ पर इसे उपसर्ग न माना जाय, यह इस वार्तिक का तात्पर्य है। उपसर्गत्व के अभाव में उपसर्ग को निमित्त मानकर के होने वाले कार्य नहीं हो सकेंगे। जैसे- दुर्+स्थितिः-दुःस्थितिः में उपसर्गत् सुनोति-सुवति० से होने वाला षत्व बाधित हुआ क्योंकि यह सूत्र उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे सकार को षत्व करता है। इसी तरह दुर्+भवानि में आनि लोट् से णत्व बाधित हुआ। क्यों कि यह सूत्र उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे नकार को णकार करता है।

अन्तःशब्दस्याङ्किविधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम्। यह वार्तिक है। अङ्-प्रत्यय के विधान में, किप्रत्यय के विधान में और णत्व के विधान में अन्तर्-शब्द को उपसर्ग कहना चाहिए। अप्राप्त उपसर्गत्व में उपसर्गत्व का विधान करता है। जैसे- अन्तर्-शब्द की उपसर्गसंज्ञा कहीं किसी सूत्र से प्राप्त नहीं है किन्तु उपर्युक्त तीन विधियाँ करनी हों तो उसको उपसर्ग माना जाय। उपसर्ग मानने का फल- आनि लोट् से नकार को णत्व करना है। जैसे- अन्तर्+भवानि में अन्तर् शब्द के उपसर्गत्व न होने के कारण भवानि के नकार को णत्व प्राप्त नहीं था तो इस वार्तिक से उपसर्ग मान लिये जाने के कारण आनि लोट् से णत्व होकर अन्तर्भवाणि बन गया।