लोटः सेह्यः सोऽपिच्च।
४१५- सेह्यपिच्च। सेः षष्ठ्यन्तं, हिः प्रथमान्तम्, अपित् प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। लोटो लङ्वत् से लोटः की अनुवृत्ति आती है।
लोट् लकार के सि के स्थान पर हि आदेश होता है और वह अपित् होता होता है।
सिप् में पकार की इत्संज्ञा होती है, अतः वह स्वतः पित् है। अतः यह सूत्र पित् को अपित् होने का अतिदेश कर रहा है। इसका प्रयोजन आगे एहि, स्तुहि आदि में सार्वधातुकमपित् से डिद्वत् करके विडन्ति च से गुण का निषेध करना है किन्तु इस धातु में अपित्-करण का कोई प्रयोजन नहीं है। अभी आपने पहले लोटो लङ्वत् से अडित् लकार को डित् लकार का अतिदेश किया था। अब यहाँ पित् प्रत्यय को अपित् कर रहे हैं। इसी को अतिदेश कहते हैं। जो वैसा नहीं है, उसको वैसा मान लिया जाय, ऐसा विधान ही अतिदेश कहलाता है।