Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 416
हेर्लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
अतो हेः
Aṣṭādhyāyī 6.4.105
Vṛtti Varadarājācārya

अतः परस्य हेर्लुक्। भव, भवतात्। भवतम्। भवत।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४१६- अतो हेः। अतः पञ्चम्यन्तं, हेः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में चिणो लुक् से लुक् की अनुवृत्ति आती है। यहाँ अङ्गस्य इस अधिकृत पद का विभक्तिविपरिणाम करके अङ्गात् आ जाता है।

ह्रस्व अकार से परे हि का लुक् हो जाय।

यहाँ ह्रस्व अकार से परे इस लिए कहा गया कि कहीं एहि, स्तुहि आदि में हि का लुक् न हो जाय।

भव, भवतात्। भू धातु से लोट् लकार, उसके स्थान पर मध्यमपुरुष का एकवचन सिप् आदेश, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, गुण, अवादेश, वर्णसम्मेलन आदि होकर के भवसि बना। सेह्यपिच्च से सि के स्थान पर हि आदेश हुआ,

भवहि बना, हि का अतो हे: से लुक् प्राप्त था, उसे बाधकर के तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से वैकल्पिक तातङ् आदेश हुआ, तातङ् में अनुबन्धलोप होकर तात् बचा है, भवतात् बन गया। तातङ् आदेश विकल्प से हुआ है, न होने के पक्ष में अतो हे: से हि का लुक् होकर भव बन जायेगा। इस तरह से सिप् में भव, भवतात् दो रूप बनेंगे।

भवतम्। भू धातु से लोट् लकार, अनुबन्धलोप, मध्यमपुरुष का द्विवचन थस्, भू थस् बना। सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, गुण, अवादेश करके भवथस् बना। लोटो लङ्वत् से लोट् लकार सम्बन्धी थस् को डिद्वद्भाव का अतिदेश हुआ, डित् मान लिए जाने के कारण तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से थस् के स्थान पर तम् आदेश होकर भवतम् सिद्ध हुआ।

भवत। भू धातु से लोट् लकार, अनुबन्धलोप, मध्यमपुरुष का बहुवचन थ आया, भू थ बना। सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, गुण, अवादेश करके भवथ बना। लोटो लङ्वत् से लोट् लकार सम्बन्धी थ को डिद्वद्भाव का अतिदेश हुआ और डित् मान लिए जाने के कारण तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से थ के स्थान पर त आदेश होकर भवत सिद्ध हुआ।