ङितश्चतुर्णां तामादयः क्रमात् स्युः। भवताम्। भवन्तु।
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४१४- तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः। तश्च थश्च थश्च मिप् च तेषामितरेतरद्वन्द्वस्तस्थस्थमिपः, तेषां तस्थस्थमिपाम्। ताम् च तम् च तश्च अम् च तेषामितरेतरद्वन्द्वस्तान्तन्तामः। तस्थस्थमिपां षष्ठ्यन्तं, तान्तन्तामः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। नित्यं ङितः से ङितः की अनुवृत्ति आती है।
ङित् लकारों के स्थान पर हुए तस्, थस्, थ और मिप् के स्थान पर क्रमशः ताम्, तम्, त और अम् आदेश होते हैं।
भवताम्। भू धातु से लोट् लकार, अनुबन्धलोप, प्रथमपुरुष का द्विवचन तस्, भू तस्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, गुण, अवादेश होने के बाद लोटो लङ्वत् से लोट् लकार सम्बन्धी तस् को डिद्वद्भाव का अतिदेश हुआ। डिन्त् मान लिए जाने के कारण तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से तस् के स्थान पर ताम् आदेश होकर भवताम् सिद्ध हुआ।
भवन्तु। भू धातु से लोट् लकार, अनुबन्धलोप, प्रथमपुरुष का बहुवचन झि आदेश, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, झ् के स्थान पर झोऽन्तः से अन्त् आदेश, वर्णसम्मेलन, भू+अ+अन्ति बना। गुण, अव् आदेश होकर भू+अव्+अ+अन्ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ, भव अन्ति बना। भव+अन्ति में अतो गुणे से पररूप हुआ, भवन्ति बना। एरुः से ति में इकार के स्थान पर उत्व होकर भवन्तु सिद्ध हुआ।