लोटस्तामादयः सलोपश्च।
४१३- लोटो लङ्वत्। लोटः षष्ठ्यन्तं, लङ्वत् अव्ययम्, द्विपदमिदं सूत्रम्।
लोट् लकार लङ् के समान होता है।
लङ् लकार में ङकार की इत्संज्ञा होने से वह ङित् है। इसी प्रकार लोट् लकार स्वतः ङित् नहीं, टित् है। अतः ङित् को मानकर होने वाले कार्य नहीं हो पा रहे थे। इसीलिए पाणिनि जी ने इस सूत्र को बनाया। लोट् लकार को भी लङ् के समान ङित्-लकार माना जाय, जिससे ङित् को मानकर होने वाले कार्य हो जायें। ङित् को मानकर होने वाले कार्यों का विवरण आगे देखेंगे। यह सूत्र जब ताम् आदि आदेश करना हो अथवा नित्यं ङितः से सलोप करना हो, तब प्रवृत्त होगा, अन्यत्र नहीं।