Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
Show
VṛttiGovind
LSK 412
तातङ्गदेशविधायकं विधिसूत्रम्
तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 7.1.35
Vṛtti Varadarājācārya

आशिषि तुह्योस्तातङ् वा। परत्वात्सर्वादेश:। भवतात्।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४१२- तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम्। तुश्च हिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वस्तुही, तयोस्तुह्यो:। तुह्यो: षष्ठ्यन्तं, तातङ् प्रथमान्तम्, आशिषि सप्तम्यन्तम्, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।

केवल आशीर्वाद अर्थ में हुए जो तु और हि, उनके स्थान पर तातङ् आदेश विकल्प से होता है।

तातङ् में डकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा, त में अकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और दोनों का तस्य लोप: से लोप होने से केवल तात् ही बचता है। तात् ङित् है, अत: ङित् को मानकर होने वाले कार्य सम्पूर्ण स्थानी को आदेश, गुण का अभाव आदि होंगे।

विशेष:- आशीर्वाद अर्थ में लोट् तथा लिङ् दोनों लकार होते हैं, परन्तु लोट् में प्रथमपुरुष और मध्यमपुरुष के एकवचन में दो-दो रूप बनते हैं और बाकी रूप विधि आदि अर्थ के समान ही होते हैं। कहने का तात्पर्य यह हुआ कि विधि आदि अर्थ में तातङ् नहीं होता और आशीर्वाद अर्थ में होता है। लिङ् में सारे रूपों में अन्तर आता है अर्थात् आशीर्वाद

अर्थ में होने वाले लिङ् को आशीर्लिङ् कहते हैं जिसके रूप भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः आदि होते हैं और विधि आदि अर्थ में होने वाले लिङ् को विधिलिङ् कहते हैं जिसके रूप भवेत्, भवेताम्, भवेयुः आदि बनते हैं। रूपों का अन्तर स्पष्ट है। अतः आशीर्लिङ् नाम से एक अलग ही लकार का प्रयोग होता है।

भवतु, भवतात्। भू-धातु से लोट् च इस सूत्र के द्वारा विधि आदि अर्थ में लोट् लकार का विधान हुआ, तिप् आया, अनुबन्धलोप हुआ। भू ति बना। ति की सार्वधातुकसंज्ञा और कर्तरि शप् से शप्, अनुबन्धलोप होने के बाद भू+अ+ति बना। शप् वाले अकार की सार्वधातुकसंज्ञा, भू में ऊकार का सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, भो+अ+ति बना। भो+अ में एचोऽयवायावः से अव् आदेश, भू+अव्+अ+ ति बना, वर्णसम्मेलन- भवति बना। अव सूत्र लगा- एरुः। लोट् लकार से सम्बन्धित इकार है भवति का इकार, उसके स्थान पर उकार आदेश हुआ तो बना- भवतु। इसके बाद सूत्र लगा- तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम्। आशीर्वाद अर्थ में लोट् लकार होता ही है। अतः भवतु बन जाने के बाद तु के स्थान पर इस सूत्र से तातङ् आदेश हुआ। अनुबन्धलोप हुआ, तात् बचा। भवतात् बना। यह सूत्र विकल्प से तातङ् आदेश करता है एक पक्ष में आदेश नहीं हुआ तो तु ही रह गया- भवतु। इस प्रकार से तिप् में भवतु और भवतात् ये दो रूप बने।