भविष्यदर्थाद्धातोर्लुट् क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा। स्यः। इट्।
भविष्यति। भविष्यतः। भविष्यन्ति। भविष्यसि। भविष्यथः। भविष्यथ।
भविष्यामि। भविष्यावः। भविष्यामः।
४०८- लृट् शेषे च। लृट् प्रथमान्तं, शेषे सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। भविष्यति गम्यादयः से भविष्यति और तुमन्णुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् से क्रियायां क्रियार्थायाम् की अनुवृत्ति आती है।
एक क्रिया के लिए दूसरी क्रिया उपपद हो या न हो तो (सामान्य) भविष्यत् काल में लृट्-लकार होता है।
सामान्य का तात्पर्य यह है कि इससे पहले अनद्यतने लृट् से अनद्यतन भविष्यत् काल में लृट्-लकार का विधान किया गया था किन्तु प्रस्तुत सूत्र अद्यतन-अनद्यतन दोनों में लृट् करता है। इसमें परोक्ष या अपरोक्ष आदि की भी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि भविष्यत्काल हमेशा परोक्ष ही होता है। एक क्रिया के लिए दूसरी क्रिया का प्रयोग यहाँ उतना प्रसिद्ध नहीं है, उत्तरकृदन्तप्रकरणस्थ तुमन्-प्रत्यय के प्रकरण में स्पष्ट हो जायेगा। वैसे जब एक क्रिया दूसरी क्रिया के लिए की जाती है तो पहली क्रिया को क्रियार्थक क्रिया कहा जाता है। यह सूत्र क्रियार्थक-क्रिया होने पर और क्रियार्थक-क्रिया के न होने पर दोनों अवस्थाओं में धातु से लृट् लकार करता है। जैसे- पठिष्यति इति गच्छति में पठन क्रिया के लिए गमन क्रिया है। अतः पठन-क्रियार्थक गमन क्रिया के उपपद में रहते पठ् धातु से लृट् होकर पठिष्यति (इति गच्छति) रूप सिद्ध होता है। जब क्रियार्थक क्रिया उपपद में न हो तो भी धातु से सामान्य भविष्यत् अर्थ में लृट् होता है। अतः केवल पठिष्यति, खादिष्यति आदि भी होंगे।
भविष्यति। भविष्यतः। भविष्यन्ति। भविष्यसि। भविष्यथः। भविष्यथ। भविष्यामि। भविष्यावः। भविष्यामः। भू-धातु से लृट् शेषे च से सामान्य भविष्यत् अर्थ में लृट्-लकार, अनुबन्धलोप, तिप् आदेश, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् की प्राप्ति, उसे बाधकर स्यतासी लृलुटोः से स्य-प्रत्यय, भू+स्य+ति बना। स्य की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा, उसको आर्धधातुकस्येड्वलादेः से इडागम, टित् होने के कारण उसके आदि में बैठा, भू+इ+स्य+ति बना। भू में ऊकार का सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, भो+इ में एचोऽयवायावः से अव् आदेश, भू+अव्+इ+स्य+ति बना। इ से परे स्य के सकार का आदेशप्रत्यययोः से षत्व हुआ, वर्णसम्मेलन करके भविष्यति बना। भविष्यतः में भी यही प्रक्रिया अपनानी है। भिन्नता केवल तस् और सकार के रुत्वविसर्ग करने में है। भविष्यन्ति में झि के झकार के स्थान पर झोऽन्तः से अन्त्-आदेश और अतो गुणो से पररूप करना है। भविष्यसि, भविष्यथः, भविष्यथ भी भविष्यति की तरह बनेंगे, द्विवचन में सकार को रुत्वविसर्ग होगा। भविष्यामि में अतो दीर्घो यञि से स्य के अकार को दीर्घ होगा और भविष्यावः, भविष्यामः में दीर्घ के बाद सकार को रुत्वविसर्ग करिये।