Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 407
सकारलोपविधायकं विधिसूत्रम्
रि च
Aṣṭādhyāyī 7.4.51
Vṛtti Varadarājācārya

रादौ प्रत्यये परे तथा।

भवितारौ। भवितारः। भवितासि। भवितास्थः। भवितास्थ। भवितास्मि।

भवितास्वः। भवितास्मः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४०७- रि च। रि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तासस्त्योर्लोपः पूरा सूत्र अनुवर्तन होकर आता है।

तासि प्रत्यय और अस्-धातु के सकार का लोप होता है रकारादि प्रत्यय के परे होने पर।

भवितारौ। भवितारः। भू-धातु से कर्ता अर्थ में अनद्यतने लुट् से लुट्-लकार का विधान हुआ, अनुबन्धलोप लकार के स्थान पर प्रथमपुरुष का द्विवचन तस् आदेश हुआ। भू+तस् में तस् की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा हुई और कर्तरि शप् से शप् प्राप्त हुआ, उसे बाधकर स्यतासी लृलुटोः से तासि-प्रत्यय हुआ। तासि में इकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप हुआ। भू+तास्+तस् बना। तास् धातु से विहित है, तिङ् और शित् से भिन्न भी है। अतः इसकी आर्धधातुकं शेषः आर्धधातुकसंज्ञा हुई और आर्धधातुकस्येड्वलादेः से तास् को इट् का आगम हुआ तो बना भू+इ+तास्+तस्। भू+इ में सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, भो+इ बना, एचोऽयवायावः से अव् आदेश होकर भू+अव्+इ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- भवि बना, आगे तास् तस् भी है। भवितास् तस् में तस् के स्थान पर लुटः प्रथमस्य डारौरसः से रौ आदेश हुआ, भवितास् रौ बना। रि च से तास् के सकार का लोप हुआ तो भवितारौ सिद्ध हुआ। इसी प्रकार से भवितारः में भी जानना चाहिए। अन्तर केवल इतना ही है कि यह बहुवचन है और झि आता है तथा उसके स्थान पर लुटः प्रथमस्य डारौरसः से रस् आदेश होता है। रस् के सकार का रुत्व और विसर्ग होकर भवितारः सिद्ध हो जाता है।

भवितासि। मध्यमपुरुष के एकवचन में सिप् आता है, अनुबन्धलोप। तासि, अनुबन्धलोप, आर्धधातुकसंज्ञा, इट् का आगम, गुण, अवादेश, वर्णसम्मेलन के बाद भवितास् सि में तास् के सकार का तासस्त्योर्लोपः से लोप होकर भवितासि सिद्ध हो जाता है।

भवितास्थः। भवितास्थ। भवितास्मि। भवितास्वः। भवितास्मः। इन प्रयोगों में क्रमशः थस्, थ, मिप्, वस्, मस् प्रत्यय आयेंगे। तासि, अनुबन्धलोप, आर्धधातुकसंज्ञा, इट् का आगम, गुण, अवादेश, वर्णसम्मेलन करने पर ये रूप सिद्ध हो जायेंगे। सकारादि और रकारादि प्रत्ययों के परे न होने के कारण सकार का लोप नहीं हो रहा है। शेष प्रक्रिया पूर्ववत् ही है किन्तु रूपसिद्धि में आप आलस्य नहीं करना। एक-एक करके सिद्ध करते जाना।

लुट् लकार भवति आदि का अर्थ- होता है आदि।

लिट् लकार बभूव आदि का अर्थ- कभी हुए थे जो मैं ने नहीं देखा

लुट् लकार भविता आदि का अर्थ- कल या आगे भविष्य में होगा आदि अर्थ समझना चाहिए।