विध्याद्यर्थेषु धातोर्लोट्।
४०९- लोट् च। लोट् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। विधिनिमन्त्रणामन्त्रणा-धीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् पूरे सूत्र का अनुवर्तन होता है।
विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न एवं प्रार्थना इन अर्थों में धातु से लोट् लकार होता है।
विधि आदि के विशेष अर्थ आगे विधिनिमन्त्रणामन्त्रणा-धीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् में ही स्पष्ट करेंगे।
इस सूत्र के विधान में काल अर्थात् समय से कोई मतलब नहीं है।