Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 400
आर्धधातुकसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
लिट् च
Aṣṭādhyāyī 3.4.115
Vṛtti Varadarājācārya

लिडादेशस्तिङ्ङार्धधातुकसंज्ञः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४००- लिट् च। लिट् लुप्तषष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। तिङ्शित्सार्वधातुकम् से तिङ् और आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकम् की अनुवृत्ति आती है।

..... लिट् लकार के स्थान पर आदेश हुए तिङ् आर्धधातुकसंज्ञक होते हैं।

लिट् की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा प्राप्त होती है और उसे बाधकर इस सूत्र से आर्धधातुकसंज्ञा हो जाती है। लिट् को लुप्तपष्ठीक पद इस लिए माना गया क्योंकि यहाँ पर तिङ् की अनुवृत्ति आने से लिट् का अर्थ लिट् के स्थान पर ऐसा माना गया है।