अभ्यासे झशां चरः स्युर्जशश्च। झशां जशः खयां चर इति विवेकः।
बभूव। बभूवतुः। बभूवुः।
३९९- अभ्यासे चर्च। अभ्यासे सप्तम्यन्तं, चर् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। झलां जश् झशि से झलां और जश् की अनुवृत्ति आती है।
अभ्यास में झल् के स्थान पर जश् और चर् आदेश होते हैं।
सूत्रार्थ के अनुसार यहाँ झल् के स्थान पर जश् और चर् दो प्रकार के आदेश हो रहे थे तो झलों को दो भागों में विभाजित किया गया- झश् और खय्। इन दोनों के स्थान पर क्रमशः जश् और चर् आदेश होंगे। झल् में श्, ष्, स् भी आते हैं किन्तु उनके स्थान चर् आदेश किया भी जाय तो स्थान, प्रयत्न आदि की साम्यता से शकार के स्थान पर शकार, षकार के स्थान पर षकार और सकार के स्थान पर सकार ही आदेश हो जाते हैं।
बभूव। भू धातु से कर्ता अर्थ में परोक्ष, अनद्यतन, भूत अर्थ में परोक्षे लिट् से लिट् लकार हुआ, अनुबन्धलोप, उसके स्थान पर तिप् आदि आदेश प्राप्त हुए। प्रथमपुरुषसंज्ञा, प्रथमपुरुष का एकवचन तिप् आया। अनुबन्धलोप होकर भू+ति बना। यहाँ ति की सार्वधातुकसंज्ञा नहीं होती है क्योंकि अग्रिमसूत्र लिट् च से सार्वधातुकसंज्ञा को बाधकर लिट्
लकार की आर्धधातुकसंज्ञा हो जाती है। अतः कर्तरि शप् से शप् भी नहीं हुआ। ति के स्थान पर परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः से णल् आदेश हुआ। णल् में लकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और णकार की चुटू से इत्संज्ञा तथा दोनों का तस्य लोपः से लोप हुआ। केवल अ बचा। भू अ बना। भुवो वुग् लुङ्लिटोः से वुक् आगम हुआ, अनुबन्धलोप होकर व् बचा, कित् होने के कारण भू के अन्त में बैठा, भूव् अ बना। लिटि धातोरनभ्यासस्य से भूव् को द्वित्व हुआ, भूव् भूव् अ बना। पूर्वोऽभ्यासः से पहले वाले भूव् की अभ्याससंज्ञा हुई और हलादि शेषः से अभ्याससंज्ञक भूव् में जो आदि हल् है भू, उसका शेष और अन्य हल् वकार का लोप हुआ, भू भूव् अ बना। ह्रस्वः से अभ्याससंज्ञक भू के ऊकार को ह्रस्व होकर भु हुआ, भु भूव् अ बना। भवतेरः से भु के उकार के स्थान पर अकार आदेश हुआ, भ भूव् अ बना। अभ्यासे चर्च से झश् भकार के स्थान पर जश् बकार आदेश हुआ, बभूव् अ बना, वर्णसम्मेलन हुआ- बभूव सिद्ध हुआ।
बभूवतुः। बभूवुः। भू धातु से कर्ता अर्थ और परोक्ष, अनद्यतन, भूत काल में परोक्षे लिट् से लिट् लकार, अनुबन्धलोप, उसके स्थान पर तिप् आदि आदेश प्राप्त हुए। प्रथमपुरुषसंज्ञा, प्रथमपुरुष का द्विवचन तस् आया, भू+तस् बना। यहाँ तस् की सार्वधातुकसंज्ञा नहीं होती है क्योंकि अग्रिम सूत्र लिट् च से सार्वधातुकसंज्ञा को बाधकर लिट् लकार की आर्धधातुकसंज्ञा हो जाती है। अतः कर्तरि शप् से शप् भी नहीं हुआ। तस् के स्थान पर परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः से अतुस् आदेश हुआ, भू अतुस् बना। भुवो वुग् लुङ्लिटोः से वुक् आगम, अनुबन्धलोप व् बचा, कित् होने के कारण भू के अन्त में बैठा, भूव् अतुस् बना। लिटि धातोरनभ्यासस्य से भूव् को द्वित्व हुआ, भूव् भूव् अतुस् बना। पूर्वोऽभ्यासः से पहले वाले भूव् की अभ्याससंज्ञा हुई और हलादि शेषः से अभ्याससंज्ञक भूव् में भू जो आदि हल् है, उसका शेष और अन्य हल् वकार का लोप, भू भूव् अतुस् बना। ह्रस्वः से अभ्याससंज्ञक भू के ऊकार को ह्रस्व, भु भूव् अतुस् बना। भवतेरः से भु के उकार के स्थान पर अकार आदेश, भ भूव् अतुस् बना। अभ्यासे चर्च से झश् भकार के स्थान पर जश् बकार आदेश, बभूव् अतुस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ- बभूवतुस् बना। सकार के स्थान पर रुत्वविसर्ग हुआ तो बभूवतुः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार बहुवचन में झि और उसके स्थान पर उस् आदेश होकर बभूवुः बनेगा।